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mahabharat 1.103.18: 'इन्द्र अपना पराक्रम त्याग दें और धर्मराज धर्म की उपेक्षा कर दें, परन्तु मैं सत्य को त्यागने की बात सोच भी नहीं सकता॥18॥   |   mahabharat अध्याय 1.103: सत्यवतीका भीष्मसे राज्यग्रहण और संतानोत्पादनके लिये आग्रह तथा भीष्मके द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 103: सत्यवतीका भीष्मसे राज्यग्रहण और संतानोत्पादनके लिये आग्रह तथा भीष्मके द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.103.18 
विक्रमं वृत्रहा जह्याद् धर्मं जह्याच्च धर्मराट्।
न त्वहं सत्यमुत्स्रष्टुं व्यवसेयं कथंचन॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'इन्द्र अपना पराक्रम त्याग दें और धर्मराज धर्म की उपेक्षा कर दें, परन्तु मैं सत्य को त्यागने की बात सोच भी नहीं सकता॥18॥
 
'Indra may give up his prowess and Dharmaraja may ignore Dharma, but I cannot even think of giving up truth in any way.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)