Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.100.d1h-45: वैशम्पायनजी कहते हैं - ऐसा कहकर महाभागा गंगादेवी वहाँ अन्तर्धान हो गईं। गंगाजी की इस आज्ञा का पालन करते हुए राजा शान्तनु अपने सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र के साथ राजधानी में आए। उनका हस्तिनापुर इन्द्रनगरी अमरावती के समान सुन्दर था। पुरुवंशी राजा शान्तनु अपने पुत्र के साथ वहाँ गए और अपने को समस्त कामनाओं से युक्त तथा यश की अभिलाषा रखने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने सबको भय देने वाले महापुरुष तथा अपने धर्मात्मा पुत्र को राजकार्य में सहायता देने के लिए समस्त योद्धाओं में युवराज पद पर अभिषिक्त किया। जनमेजय! शान्तनु के उस परम यशस्वी पुत्र ने अपने आचरण से अपने पिता, पौरव समाज तथा सम्पूर्ण राष्ट्र को प्रसन्न कर दिया। ऐसे धर्मात्मा पुत्र के साथ महापराक्रमी राजा शान्तनु ने सुखपूर्वक चार वर्ष व्यतीत किए। एक दिन वे यमुना नदी के किनारे वन में गए। | mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वैशम्पायनजी कहते हैं - ऐसा कहकर महाभागा गंगादेवी वहाँ अन्तर्धान हो गईं। गंगाजी की इस आज्ञा का पालन करते हुए राजा शान्तनु अपने सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र के साथ राजधानी में आए। उनका हस्तिनापुर इन्द्रनगरी अमरावती के समान सुन्दर था। पुरुवंशी राजा शान्तनु अपने पुत्र के साथ वहाँ गए और अपने को समस्त कामनाओं से युक्त तथा यश की अभिलाषा रखने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने सबको भय देने वाले महापुरुष तथा अपने धर्मात्मा पुत्र को राजकार्य में सहायता देने के लिए समस्त योद्धाओं में युवराज पद पर अभिषिक्त किया। जनमेजय! शान्तनु के उस परम यशस्वी पुत्र ने अपने आचरण से अपने पिता, पौरव समाज तथा सम्पूर्ण राष्ट्र को प्रसन्न कर दिया। ऐसे धर्मात्मा पुत्र के साथ महापराक्रमी राजा शान्तनु ने सुखपूर्वक चार वर्ष व्यतीत किए। एक दिन वे यमुना नदी के किनारे वन में गए।
Vaishampayanji says – Saying this, Mahabhaga Gangadevi vanished there. Following this order from Gangaji, King Shantanu came to the capital with his son who was as bright as the sun. His Hastinapur was as beautiful as Indranagari Amravati. Puruvanshi king Shantanu went there with his son and started considering himself full of all desires and aspiring for success. Thereafter, he anointed the great man who gave fear to all and his virtuous son as the crown prince among all the warriors to assist him in the administration. Janamejaya! That very successful son of Shantanu pleased his father, Pauravas society and the entire nation with his conduct. The mighty King Shantanu spent four years living happily with such a virtuous son. One day he went to the forest near Yamuna river. 40-45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥