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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  1.100.99 
तत: स पितुरर्थाय तामुवाच यशस्विनीम्।
अधिरोह रथं मातर्गच्छाव: स्वगृहानिति॥ ९९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् पितामह भीष्म की इच्छा पूर्ण करने के लिए उन्होंने उस यशस्वी निषादकन्या से कहा - 'माते! आप इस रथ पर बैठ जाइए। अब हम अपने घर चलें।'
 
After that, to fulfill the wish of father Bhishma, he said to that famous Nishadkanya - 'Mother! Sit on this chariot. Now let us go to our home. 99॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)