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mahabharat 1.100.93: वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! निषादराज का यह अभिप्राय समझकर सत्यनिष्ठ कुमार देवव्रत ने पिता को प्रसन्न करने की इच्छा से उस समय यह कठोर प्रतिज्ञा की ॥93॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  1.100.93 
वैशम्पायन उवाच
तस्यैतन्मतमाज्ञाय सत्यधर्मपरायण:।
प्रत्यजानात् तदा राजन् पितु: प्रियचिकीर्षया॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! निषादराज का यह अभिप्राय समझकर सत्यनिष्ठ कुमार देवव्रत ने पिता को प्रसन्न करने की इच्छा से उस समय यह कठोर प्रतिज्ञा की ॥93॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! Understanding this intention of Nishadraj, Kumar Devavrat, who was committed to the truth, made this strict vow at that time with the desire to please his father. 93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)