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mahabharat 1.100.89: उन्होंने कहा—'हे प्रतापी राजकुमार! आप राजा शान्तनु की ओर से स्वामी बनकर यहाँ आये हैं। हे धर्मात्मा! इस कन्या पर भी आपका पूर्ण अधिकार है। आप इसे जिसे चाहें दे सकते हैं। आप सब कुछ करने में समर्थ हैं॥89॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  1.100.89 
त्वमेव नाथ: सम्प्राप्त: शान्तनोरमितद्युते।
कन्यायाश्चैव धर्मात्मन् प्रभुर्दानाय चेश्वर:॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने कहा—'हे प्रतापी राजकुमार! आप राजा शान्तनु की ओर से स्वामी बनकर यहाँ आये हैं। हे धर्मात्मा! इस कन्या पर भी आपका पूर्ण अधिकार है। आप इसे जिसे चाहें दे सकते हैं। आप सब कुछ करने में समर्थ हैं॥89॥
 
He said—'O glorious prince! You have come here as the owner on behalf of King Shantanu. O virtuous one! You have full rights over this girl as well. You can give her to whomever you want. You are capable of doing everything.॥ 89॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)