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mahabharat 1.100.72: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजा के दुःख का कारण जानकर परम बुद्धिमान देवव्रत ने भी अपनी बुद्धि से उस पर विचार किया।   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  1.100.72 
वैशम्पायन उवाच
ततस्तत्कारणं राज्ञो ज्ञात्वा सर्वमशेषत:।
देवव्रतो महाबुद्धि: प्रज्ञया चान्वचिन्तयत्॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजा के दुःख का कारण जानकर परम बुद्धिमान देवव्रत ने भी अपनी बुद्धि से उस पर विचार किया।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! Having known the whole reason for the king's sorrow, the extremely intelligent Devavrata also pondered over it with his intellect. 72.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)