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mahabharat 1.100.63: 'पुत्र! इसमें कोई संदेह नहीं कि मैं सदैव चिंता में डूबा रहता हूँ। मैं तुम्हें बताता हूँ कि वह चिंता कैसी होती है, सुनो। भरत! इस विशाल वंश में तुम मेरे इकलौते पुत्र हो।   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  1.100.63 
असंशयं ध्यानपरो यथा वत्स तथा शृणु।
अपत्यं नस्त्वमेवैक: कुले महति भारत॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
'पुत्र! इसमें कोई संदेह नहीं कि मैं सदैव चिंता में डूबा रहता हूँ। मैं तुम्हें बताता हूँ कि वह चिंता कैसी होती है, सुनो। भरत! इस विशाल वंश में तुम मेरे इकलौते पुत्र हो।
 
‘Son! There is no doubt that I am always immersed in worry. I will tell you what that worry is like, listen. Bharat! You are my only son in this huge lineage.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)