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mahabharat 1.100.61: 'राजन्! आप चुपचाप बैठे हैं, मानो किसी का ध्यान कर रहे हों; मुझसे बात भी नहीं करते; घोड़े पर भी नहीं जाते; आपकी कान्ति क्षीण हो रही है; आप पीले और दुबले हो गए हैं॥ 61॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  1.100.61 
ध्यायन्निव च मां राजन्नाभिभाषसि किंचन।
न चाश्वेन विनिर्यासि विवर्णो हरिण: कृश:॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
'राजन्! आप चुपचाप बैठे हैं, मानो किसी का ध्यान कर रहे हों; मुझसे बात भी नहीं करते; घोड़े पर भी नहीं जाते; आपकी कान्ति क्षीण हो रही है; आप पीले और दुबले हो गए हैं॥ 61॥
 
‘King! You sit silently as if you are meditating on someone; you do not even talk to me. You do not even go out on horseback. Your radiance is fading. You have become pale and thin.॥ 61॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)