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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.100.58 
स चिन्तयन्नेव तदा दाशकन्यां महीपति:।
प्रत्ययाद्धास्तिनपुरं कामोपहतचेतन:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
काम की पीड़ा से उनका मन अशांत हो गया था। उस निषाद कन्या का स्मरण करते हुए वे उसी समय हस्तिनापुर लौट आये। 58.
 
His mind was restless due to the pangs of lust. Thinking of that Nishad girl, he returned to Hastinapur at that time. 58.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)