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mahabharat 1.100.5: उन महाप्रतापी महाराज के धर्ममय आचरण को देखकर सब लोग सदैव इस निष्कर्ष पर पहुँचते थे कि धर्म, काम और धन से श्रेष्ठ है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.100.5 
तस्य कीर्तिमतो वृत्तमवेक्ष्य सततं नरा:।
धर्म एव पर: कामादर्थाच्चेति व्यवस्थिता:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उन महाप्रतापी महाराज के धर्ममय आचरण को देखकर सब लोग सदैव इस निष्कर्ष पर पहुँचते थे कि धर्म, काम और धन से श्रेष्ठ है ॥5॥
 
Seeing the righteous conduct of that illustrious Maharaja, all people always came to the conclusion that religion is superior to work and money. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)