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mahabharat 1.100.48-50: भीरु! तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो और क्या करना चाहती हो? वह बोली - 'हे राजन! आपका कल्याण हो। मैं निषाद कन्या हूँ और अपने पिता, महाबली निषादराज की आज्ञा से परकल्याण के लिए नाव चलाती हूँ।' राजा शान्तनु ने उस अप्सरा के समान सुन्दरता, माधुर्य और सुगन्ध से युक्त निषाद कन्या को देखकर उसे पाने की इच्छा की। तत्पश्चात् उसके पिता के पास जाकर उन्होंने उसे चुन लिया।   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 48-50
 
 
श्लोक  1.100.48-50 
कस्य त्वमसि का चासि किं च भीरु चिकीर्षसि।
साब्रवीद् दाशकन्यास्मि धर्मार्थं वाहये तरिम्॥ ४८॥
पितुर्नियोगाद् भद्रं ते दाशराज्ञो महात्मन:।
रूपमाधुर्यगन्धैस्तां संयुक्तां देवरूपिणीम्॥ ४९॥
समीक्ष्य राजा दाशेयीं कामयामास शान्तनु:।
स गत्वा पितरं तस्या वरयामास तां तदा॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
भीरु! तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो और क्या करना चाहती हो? वह बोली - 'हे राजन! आपका कल्याण हो। मैं निषाद कन्या हूँ और अपने पिता, महाबली निषादराज की आज्ञा से परकल्याण के लिए नाव चलाती हूँ।' राजा शान्तनु ने उस अप्सरा के समान सुन्दरता, माधुर्य और सुगन्ध से युक्त निषाद कन्या को देखकर उसे पाने की इच्छा की। तत्पश्चात् उसके पिता के पास जाकर उन्होंने उसे चुन लिया।
 
'Bhiru! Who are you, whose daughter are you and what do you wish to do?' She said - 'O King! May you be blessed. I am a Nishad girl and I row a boat for the welfare of others by the order of my father, the great Nishad king.' King Shantanu, seeing that Nishad girl who was like a celestial nymph endowed with beauty, sweetness and fragrance, desired to have her. Thereafter, going to her father, he chose her. 48-50.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)