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mahabharat 1.100.46: वहाँ राजा को एक अवर्णनीय और उत्तम सुगंध का अनुभव हुआ और वह उसके मूल की खोज में सर्वत्र भटकने लगा ॥46॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  1.100.46 
महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम्।
तस्य प्रभवमन्विच्छन् विचचार समन्तत:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
वहाँ राजा को एक अवर्णनीय और उत्तम सुगंध का अनुभव हुआ और वह उसके मूल की खोज में सर्वत्र भटकने लगा ॥46॥
 
There the king experienced an indescribable and exquisite fragrance. He started wandering everywhere in search of its origin. ॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)