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mahabharat 1.100.32: गंगा दिव्य आभूषणों से सुसज्जित थीं और उन्होंने स्वच्छ एवं सुंदर साड़ी पहन रखी थी। इससे उनका अनुपम सौंदर्य इतना निखर गया कि राजा शांतनु उन्हें पहले देखकर भी पहचान नहीं पाए।   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.100.32 
अलंकृतामाभरणैर्विरजोऽम्बरसंवृताम्।
दृष्टपूर्वामपि स तां नाभ्यजानात् स शान्तनु:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
गंगा दिव्य आभूषणों से सुसज्जित थीं और उन्होंने स्वच्छ एवं सुंदर साड़ी पहन रखी थी। इससे उनका अनुपम सौंदर्य इतना निखर गया कि राजा शांतनु उन्हें पहले देखकर भी पहचान नहीं पाए।
 
Ganga was adorned with divine ornaments and was wearing a clean and beautiful sari. This enhanced her matchless beauty so much that King Shantanu could not recognize her even though he had seen her before.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)