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mahabharat 1.100.25-26: तदनन्तर महामनस्वी राजा इसका कारण जानने के लिए आगे बढ़े और जब उन्होंने चारों ओर दृष्टि डाली तो देखा कि एक विशाल, मनोहर रूप वाला राजकुमार देवराज इन्द्र के समान दिव्यास्त्रों का अभ्यास कर रहा है तथा अपने तीखे बाणों से गंगा के सम्पूर्ण प्रवाह को रोके हुए खड़ा है।   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  1.100.25-26 
ततो निमित्तमन्विच्छन् ददर्श स महामना:।
कुमारं रूपसम्पन्नं बृहन्तं चारुदर्शनम्॥ २५॥
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं यथा देवं पुरन्दरम्।
कृत्स्नां गङ्गां समावृत्य शरैस्तीक्ष्णैरवस्थितम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर महामनस्वी राजा इसका कारण जानने के लिए आगे बढ़े और जब उन्होंने चारों ओर दृष्टि डाली तो देखा कि एक विशाल, मनोहर रूप वाला राजकुमार देवराज इन्द्र के समान दिव्यास्त्रों का अभ्यास कर रहा है तथा अपने तीखे बाणों से गंगा के सम्पूर्ण प्रवाह को रोके हुए खड़ा है।
 
Thereafter, the great-minded king went ahead to find out the reason behind this and when he looked around, he saw that a huge, handsome prince with a charming form was practicing divine weapons like the king of gods Indra and was standing there blocking the entire flow of the Ganga with his sharp arrows. 25-26.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)