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mahabharat 1.100.24: उसे देखकर पुरुषोत्तम महाराज शान्तनु को चिंता हुई कि नदियों में श्रेष्ठ यह देवनदी पहले के समान क्यों नहीं बह रही है॥ 24॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.100.24 
तां दृष्ट्वा चिन्तयामास शान्तनु: पुरुषर्षभ:।
स्यन्दते किं त्वियं नाद्य सरिच्छ्रेष्ठा यथा पुरा॥ २४॥
 
 
अनुवाद
उसे देखकर पुरुषोत्तम महाराज शान्तनु को चिंता हुई कि नदियों में श्रेष्ठ यह देवनदी पहले के समान क्यों नहीं बह रही है॥ 24॥
 
On seeing her, Maharaja Shantanu, the best of men, became worried as to why this Devnadi, the best of rivers, is not flowing like before.॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)