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mahabharat 1.100.15: हे जनमेजय! महाराज शान्तनु जब इस पृथ्वी पर शासन करते थे, तब पशु, सूअर, मृग और पक्षी आदि किसी को नहीं मारा जाता था॥15॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.100.15 
वध: पशुवराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम्।
शान्तनौ पृथिवीपाले नावर्तत तथा नृप॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे जनमेजय! महाराज शान्तनु जब इस पृथ्वी पर शासन करते थे, तब पशु, सूअर, मृग और पक्षी आदि किसी को नहीं मारा जाता था॥15॥
 
O Janamejaya! While Maharaja Shantanu was ruling this earth, animals, boars, deer and birds were not killed. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)