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mahabharat 1.100.14: उनमें न तो प्रेम था, न घृणा। चाँद की तरह, सभी उन्हें देखना पसंद करते थे। वे तेज में सूर्य और वेग में वायु के समान थे; क्रोध में यमराज और क्षमा में पृथ्वी के समान थे।   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.100.14 
अरागद्वेषसंयुक्त: सोमवत् प्रियदर्शन:।
तेजसा सूर्यकल्पोऽभूद् वायुवेगसमो जवे।
अन्तकप्रतिम: कोपे क्षमया पृथिवीसम:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उनमें न तो प्रेम था, न घृणा। चाँद की तरह, सभी उन्हें देखना पसंद करते थे। वे तेज में सूर्य और वेग में वायु के समान थे; क्रोध में यमराज और क्षमा में पृथ्वी के समान थे।
 
There was neither love nor hatred in him. Like the moon, everyone loved to see him. He appeared like the sun in brightness and the wind in speed; he was like Yamraj in anger and the earth in forgiveness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)