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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 10: रुरु मुनि और डुण्डुभका संवाद  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.10.5 
सौतिरुवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य भुजगस्य रुरुस्तदा।
नावधीद् भयसंविग्नमृषिं मत्वाथ डुण्डुभम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - दुन्दुभ सर्प के ये वचन सुनकर रुरु ने सोचा कि यह भयभीत ऋषि है, इसलिए उन्होंने उसे नहीं मारा।
 
Ugrasravaji says - On hearing these words of the Dundubha serpent, Ruru thought that he was a frightened sage and hence did not kill him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)