Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.10.4: हे! यह आश्चर्य की बात है कि बेचारे द्रुण्डुभास दुःख भोगने में तो समस्त सर्पों के साथ एक हैं; परन्तु उनका स्वभाव अन्य सर्पों से भिन्न है और दुःख भोगने में तो वे समस्त सर्पों के साथ एक हैं; परन्तु उनका सुख भिन्न है। आप धर्म के ज्ञाता हैं, अतः आपको द्रुण्डुभास को कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिए॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.10: रुरु मुनि और डुण्डुभका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 10: रुरु मुनि और डुण्डुभका संवाद  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.10.4 
एकानर्थान् पृथगर्थानेकदु:खान् पृथक्सुखान्।
डुण्डुभान् धर्मविद् भूत्वा न त्वं हिंसितुमर्हसि॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे! यह आश्चर्य की बात है कि बेचारे द्रुण्डुभास दुःख भोगने में तो समस्त सर्पों के साथ एक हैं; परन्तु उनका स्वभाव अन्य सर्पों से भिन्न है और दुःख भोगने में तो वे समस्त सर्पों के साथ एक हैं; परन्तु उनका सुख भिन्न है। आप धर्म के ज्ञाता हैं, अतः आपको द्रुण्डुभास को कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिए॥4॥
 
Oh! It is astonishing that the poor Drundubhas are one with all the snakes in suffering misfortunes; but their nature is different from other snakes and in suffering sorrows they are one with all the snakes; but their happiness is different. You are knowledgeable about Dharma, therefore you should not harm the Drundubhas.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)