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mahabharat 1.10.1-2: रुरु ने कहा- सर्प! मेरी प्राणों से भी अधिक प्रिय पत्नी को सर्प ने डस लिया था। उसी समय मैंने यह दृढ़ प्रतिज्ञा की थी कि मैं जो भी सर्प देखूँगा, उसे मार डालूँगा। उसी प्रतिज्ञा के अनुसार मैं तुम्हें मारना चाहता हूँ। अतः आज तुम्हें अपने प्राण त्यागने होंगे॥ 1-2॥   |   mahabharat अध्याय 1.10: रुरु मुनि और डुण्डुभका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 10: रुरु मुनि और डुण्डुभका संवाद  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  1.10.1-2 
रुरुरुवाच
मम प्राणसमा भार्या दष्टासीद् भुजगेन ह।
तत्र मे समयो घोर आत्मनोरग वै कृत:॥ १॥
भुजङ्गं वै सदा हन्यां यं यं पश्येयमित्युत।
ततोऽहं त्वां जिघांसामि जीवितेनाद्य मोक्ष्यसे॥ २॥
 
 
अनुवाद
रुरु ने कहा- सर्प! मेरी प्राणों से भी अधिक प्रिय पत्नी को सर्प ने डस लिया था। उसी समय मैंने यह दृढ़ प्रतिज्ञा की थी कि मैं जो भी सर्प देखूँगा, उसे मार डालूँगा। उसी प्रतिज्ञा के अनुसार मैं तुम्हें मारना चाहता हूँ। अतः आज तुम्हें अपने प्राण त्यागने होंगे॥ 1-2॥
 
Ruru said- Snake! My wife, dearer than my life, was bitten by a snake. At that time itself I made a solemn vow that I will kill every snake I see. According to that vow, I want to kill you. Therefore, today you will have to give up your life.॥ 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)