अब, जहाँ तक सजीव प्राणियों का प्रश्न है, उन्हें इस भौतिक प्रकृति में डाला जाता है, और वे अपने पिछले कर्मों के फलस्वरूप भिन्न-भिन्न स्थितियाँ प्राप्त करते हैं। इस प्रकार इस भौतिक जगत की गतिविधियाँ प्रारम्भ होती हैं। सजीव प्राणियों की विभिन्न प्रजातियों की गतिविधियाँ सृष्टि के क्षण से ही आरम्भ हो जाती हैं। ऐसा नहीं है कि सब कुछ विकसित हुआ है। जीवन की विभिन्न प्रजातियाँ ब्रह्माण्ड के साथ ही तुंरत सृजित की गयी हैं। मनुष्य, पशु, जंगली जानवर, पक्षी – सब कुछ एक साथ सृजित किया गया है, क्योंकि जीवित प्राणियों ने अंतिम विनाश के समय जो भी इच्छाएँ की थीं, वे सब फिर से प्रकट हो जाती हैं। यहाँ स्पष्ट रूप से अवाशम् शब्द द्वारा इंगित किया गया है कि सजीव प्राणियों का इस प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं है। पिछले सृजन में उनके पिछले जीवन की स्थिति फिर से बस प्रकट होती है, और यह सब कार्य केवल उनकी इच्छा से ही होता है। यही ईश्वर की वह असीम शक्ति है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। और जीवन की विभिन्न प्रजातियों को बनाने के बाद, उनका उनसे कोई संबंध नहीं है। यह सृजन विभिन्न सजीव प्राणियों की इच्छाओं को समायोजित करने के लिए होता है, और इसलिए भगवान् इसमें सम्मिलित नहीं होते।
