श्रीमद् भगवद्-गीता  »  अध्याय 7: भगवद्ज्ञान  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  7.29 
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
जो बुद्धिमान पुरुष जरा और मृत्यु से मुक्ति के लिए प्रयत्नशील हैं, वे भक्ति द्वारा मेरी शरण लेते हैं। वे वास्तव में ब्रह्म हैं, क्योंकि वे दिव्य कार्यों के विषय में पूर्णतः जानते हैं।
 
Those wise persons who strive to be free from old age and death take refuge in My devotion. They are truly Brahman because they are fully aware of the transcendental actions.
तात्पर्य
जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग इस भौतिक शरीर को प्रभावित करते हैं पर आध्यात्मिक शरीर को नहीं। आध्यात्मिक शरीर को कोई जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था या रोग नहीं होता है, इसलिए जो व्यक्ति आध्यात्मिक शरीर प्राप्त कर लेता है, वह भगवान के इष्ट मित्रों में से एक बन जाता है और शाश्वत भक्ति सेवा में संलग्न होकर वास्तव में मुक्त हो जाता है। अहं ब्रह्मास्मि: मैं आत्मा हूँ। ऐसा कहा जाता है कि व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि वह ब्रह्म है, आत्मा है। जीवन की यह ब्रह्म अवधारणा भी भक्ति सेवा में होती है, जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है। शुद्ध भक्त ब्रह्म स्तर पर परम श्रेष्ठ रूप से स्थित होते हैं, और वे पारमार्थिक गतिविधियों के बारे में सब कुछ जानते हैं।

चार प्रकार के अशुद्ध भक्त जो भगवान की पारलौकिक सेवा में संलग्न होते हैं, वे अपने-अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं, और भगवान के अनुग्रह से, जब वे पूरी तरह से कृष्णभावनायुक्त हो जाते हैं, तो वे वास्तव में भगवान के साथ आध्यात्मिक संगति का आनंद उठाते हैं। लेकिन जो लोग देवताओं के उपासक होते हैं, वे कभी भी भगवान को उनके परम ग्रह पर प्राप्त नहीं करते हैं। कम बुद्धिमान ब्रह्म-साक्षात्कारी व्यक्ति भी कृष्ण के परम ग्रह गोलोक वृंदावन तक नहीं पहुँच सकते हैं। केवल वे व्यक्ति जो कृष्णभावना में गतिविधियाँ करते हैं (माम आश्रित्य) ही वास्तव में ब्रह्म कहलाने के पात्र हैं, क्योंकि वे वास्तव में कृष्ण ग्रह तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे लोगों को कृष्ण के बारे में कोई संशय नहीं होता है, और इसलिए वे तथ्यतः ब्रह्म हैं।

जो लोग भगवान के रूप या अर्चा की पूजा कर रहे हैं, या जो लोग केवल भौतिक बंधन से मुक्ति के लिए भगवान का ध्यान कर रहे हैं, वे भी भगवान के अनुग्रह से, ब्रह्म, अधिभूत आदि के अर्थों को जानते हैं, जैसा कि भगवान ने अगले अध्याय में बताया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)