चार प्रकार के अशुद्ध भक्त जो भगवान की पारलौकिक सेवा में संलग्न होते हैं, वे अपने-अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं, और भगवान के अनुग्रह से, जब वे पूरी तरह से कृष्णभावनायुक्त हो जाते हैं, तो वे वास्तव में भगवान के साथ आध्यात्मिक संगति का आनंद उठाते हैं। लेकिन जो लोग देवताओं के उपासक होते हैं, वे कभी भी भगवान को उनके परम ग्रह पर प्राप्त नहीं करते हैं। कम बुद्धिमान ब्रह्म-साक्षात्कारी व्यक्ति भी कृष्ण के परम ग्रह गोलोक वृंदावन तक नहीं पहुँच सकते हैं। केवल वे व्यक्ति जो कृष्णभावना में गतिविधियाँ करते हैं (माम आश्रित्य) ही वास्तव में ब्रह्म कहलाने के पात्र हैं, क्योंकि वे वास्तव में कृष्ण ग्रह तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे लोगों को कृष्ण के बारे में कोई संशय नहीं होता है, और इसलिए वे तथ्यतः ब्रह्म हैं।
जो लोग भगवान के रूप या अर्चा की पूजा कर रहे हैं, या जो लोग केवल भौतिक बंधन से मुक्ति के लिए भगवान का ध्यान कर रहे हैं, वे भी भगवान के अनुग्रह से, ब्रह्म, अधिभूत आदि के अर्थों को जानते हैं, जैसा कि भगवान ने अगले अध्याय में बताया है।
