यहाँ यह तर्क दिया जा सकता है कि यदि देवता ईश्वर के शरीर के विभिन्न अंग है तो उनकी आराधना करने से वही लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है| लेकिन देवताओं का भक्त कम बुद्धिमान होता है क्योंकि वो यह नहीं जानता है कि शरीर के किस अंग को भोजन दिया जाना चाहिए| उनमें से कुछ इतने मूर्ख है कि वो यह कहते है कि कई अंग है और भोजन देने के कई रास्ते है| यह सही बात नहीं है| क्या कोई भी शरीर को कानों या आँखों से भोजन दे सकता है? वो यह नहीं जानते है क्या कि यह देवता परमेश्वर के विश्वरूप के विभिन्न अंग है और अपनी अज्ञानता में वो यह मान लेते है कि हर देवता एक अलग ईश्वर है और परमेश्वर का प्रतिस्पर्द्धी है|
न केवल देवता बल्कि अन्य जीव भी परमेश्वर का ही अंग है| श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि ब्राह्मण परमेश्वर का मस्तक है, क्षत्रिय उसकी भुजाएँ है, वैश्य उसकी कमर है और शूद्र उसके पैर है और सभी अपने अलग कार्य करते है| परिस्थिति चाहे जो भी हो यदि कोई यह जानता है कि देवता और वो दोनों परमेश्वर का ही अंश है तो उसका ज्ञान परिपूर्ण है| लेकिन यदि वो यह नहीं समझता है तो वो विभिन्न ग्रहों को प्राप्त करता है जहाँ देवता निवास करते है| यह वह स्तर नहीं है जिसे भक्त प्राप्त करता है|
देवताओं के आशीर्वाद से प्राप्त होने वाले परिणाम नष्ट हो जाने वाले होते है क्योंकि इस भौतिक संसार में ग्रह, देवता और उनके भक्त सभी नष्ट होने वाले है| इसलिए इस पद्य में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि देवताओं की आराधना करने से प्राप्त होने वाले सभी परिणाम नष्ट हो जाने वाले होते है और इसलिए इस प्रकार की आराधना कम बुद्धिमान जीव ही करते है| शुद्ध भक्त जो कि कृष्ण चेतना में, परमेश्वर की सेवा में लीन रहता है, अविनाशी आनंदमयी अस्तित्व को प्राप्त कर लेता है जो कि ज्ञान से भरी हुई होती है, उसकी प्राप्ति और सामान्य देवताओं के भक्त की प्राप्ति में अंतर होता है| परमेश्वर असीमित है| उसका पक्षपात असीमित है| उसकी दया असीमित है| इसलिए अपने शुद्ध भक्तों पर परमेश्वर की दया भी असीमित होती है|
