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श्लोक 4.32  |
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥ |
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| अनुवाद |
| ये सभी प्रकार के यज्ञ वेदों द्वारा अनुमोदित हैं और ये सभी भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्मों से उत्पन्न होते हैं। इन्हें इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे। |
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| These different types of sacrifices are in accordance with the Vedas and all of them are born out of different types of actions. Knowing them in this form, you will be liberated. |
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