श्रीमद् भगवद्-गीता  »  अध्याय 3: कर्मयोग  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.42 
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
कर्मेन्द्रियाँ जड़ पदार्थ से श्रेष्ठ हैं; मन इन्द्रियों से भी श्रेष्ठ है; बुद्धि मन से भी श्रेष्ठ है; और वह (आत्मा) बुद्धि से भी श्रेष्ठ है।
 
The organs of action are superior to material objects, the mind is superior to the senses, the intellect is higher than the mind and the soul is even superior to the intellect.
तात्पर्य
इंद्रियाँ काम की गतिविधियों के लिए विभिन्न मार्ग हैं। काम शरीर के भीतर होता है, पर इंद्रियों के माध्यम से ही यह निकलता है। इसलिए, इंद्रियाँ शरीर से बढ़कर हैं। जब श्रेष्ठ चेतना होती है, या कृष्ण भाव बोध होता है तो ये मार्ग काम नहीं आते। कृष्ण भाव बोध में, आत्मा साक्षात् भगवान् के संपर्क में आती है, इसलिए शरीर की क्रियाओं की श्रेणीबद्धता, जिसका वर्णन यहाँ किया गया है, अंततः परम आत्मा में समाप्त हो जाती है। शारीरिक क्रिया का अर्थ है इंद्रियों की क्रियाएँ, और इंद्रियों को रोकने का अर्थ है सभी शारीरिक क्रियाओं को रोकना। पर चूँकि मन सक्रिय होता है, शरीर शांत और स्थिर हो सकता है फिर भी मन काम करेगा - जैसे कि सपने आने पर होता है। पर मन से ऊपर, बुद्धि का निश्चय होता है, और बुद्धि से ऊपर, आत्मा होती है। इसलिए, यदि आत्मा सीधे परम के साथ लगी हुई है, स्वाभाविक है अन्य सभी अधीनस्थ, अर्थात् बुद्धि, मन और इंद्रियाँ भी अपने आप ही लगी हुई होंगी। कठोपनिषद में एक समान श्लोक है, जिसमें कहा गया है कि इंद्रियों की तुष्टि के विषय इंद्रियों से श्रेष्ठ होते हैं, और मन इंद्रियों की तुष्टि के विषयों से श्रेष्ठ होता है। यदि, तब मन निरंतर भगवान् की सेवा में लगा हुआ हो, तो इसमें कोई संभावना नहीं कि इंद्रियाँ अन्य मार्गों में लगेंगी। यह मानसिक वृत्ति पहले ही समझाई जा चुकी है। परं दृष्टवा निवर्तते। यदि मन भगवान् की आध्यात्मिक सेवा में लगा हुआ हो, तो यह निम्न प्रवृत्तियों में लगता ही नहीं। कठोपनिषद में आत्मा का वर्णन महान् के रूप में किया गया है। इसलिए आत्मा सभी से ऊपर है - जैसे, इंद्रियों की तुष्टि के विषय, इंद्रियाँ, मन और बुद्धि। इसलिए, आत्मा की संवैधानिक स्थिति को सीधे समझना ही पूरी समस्या का समाधान है।

बुद्धि से व्यक्ति को आत्मा की संवैधानिक स्थिति को खोजना होता है और फिर मन को हमेशा कृष्ण भाव बोध में लगाना होता है। इससे पूरी समस्या का समाधान हो जाता है। सामान्यतः एक नौसिखिए आध्यात्मिकवादी को इंद्रियों की तुष्टि के विषयों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। इसके अतिरिक्त, बुद्धि का उपयोग करके मन को मजबूत करना होगा। यदि बुद्धि द्वारा व्यक्ति अपने मन को कृष्ण भाव बोध में, भगवान् के समक्ष पूर्ण समर्पण करके, लगाता है, तब स्वतः ही मन मजबूत हो जाता है, और भले ही इंद्रियाँ बहुत मजबूत हों, साँपों की तरह, वे टूटे हुए दाँत वाले साँपों से ज्यादा प्रभावशाली नहीं रहेंगी। पर भले ही आत्मा बुद्धि और मन की स्वामी हो, और इंद्रियों की भी, फिर भी, जब तक वह कृष्ण भाव बोध में कृष्ण से जुड़कर मजबूत न हो, उत्तेजित मन के कारण गिरने की संभावना बनी रहती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)