बुद्धि से व्यक्ति को आत्मा की संवैधानिक स्थिति को खोजना होता है और फिर मन को हमेशा कृष्ण भाव बोध में लगाना होता है। इससे पूरी समस्या का समाधान हो जाता है। सामान्यतः एक नौसिखिए आध्यात्मिकवादी को इंद्रियों की तुष्टि के विषयों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। इसके अतिरिक्त, बुद्धि का उपयोग करके मन को मजबूत करना होगा। यदि बुद्धि द्वारा व्यक्ति अपने मन को कृष्ण भाव बोध में, भगवान् के समक्ष पूर्ण समर्पण करके, लगाता है, तब स्वतः ही मन मजबूत हो जाता है, और भले ही इंद्रियाँ बहुत मजबूत हों, साँपों की तरह, वे टूटे हुए दाँत वाले साँपों से ज्यादा प्रभावशाली नहीं रहेंगी। पर भले ही आत्मा बुद्धि और मन की स्वामी हो, और इंद्रियों की भी, फिर भी, जब तक वह कृष्ण भाव बोध में कृष्ण से जुड़कर मजबूत न हो, उत्तेजित मन के कारण गिरने की संभावना बनी रहती है।
