श्रीमद् भगवद्-गीता  »  अध्याय 3: कर्मयोग  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.39 
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार बुद्धिमान जीव की शुद्ध चेतना काम रूपी उसके शाश्वत शत्रु से आच्छादित हो जाती है, जो कभी संतुष्ट नहीं होता तथा अग्नि के समान जलता रहता है।
 
Thus the pure consciousness of the knowledgeable soul remains covered by its eternal enemy in the form of lust, which is never satisfied and keeps burning like fire.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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