अर्जुन ने कहा: हे वृष्णिवंशी! कौन सी बात मनुष्य को पापकर्मों के लिए प्रेरित करती है, चाहे वह अनिच्छा से भी क्यों न हो, मानो बलपूर्वक प्रेरित किया गया हो?
Arjun said, "O Vrishnivanshi! Why is a man inspired to commit sinful acts even though he does not want to? It seems as if he is being forced to do so."
तात्पर्य
एक जीव, परमेश्वर का एक अंश और अभिन्न अंग होने के कारण मूलतः आध्यात्मिक, शुद्ध और भौतिक प्रदूषण से मुक्त है। इसलिए, स्वभाव से वह भौतिक जगत के पापों के अधीन नहीं है। लेकिन जब वह भौतिक प्रकृति के संपर्क में आता है, तो वह बिना किसी हिचकिचाहट के कई पापपूर्ण तरीकों से कार्य करता है, और कभी-कभी अपनी इच्छा के विरुद्ध भी। जैसे, अर्जुन का कृष्ण से जीवों के विकृत स्वभाव के विषय में प्रश्न बहुत सहज है। हालांकि जीव कभी-कभी पाप में कार्य नहीं करना चाहता, फिर भी वह कार्य करने के लिए मजबूर होता है। फिर भी, पापपूर्ण कर्म भीतर के अधिआत्मा द्वारा प्रेरित नहीं होते हैं, बल्कि किसी अन्य कारण से होते हैं, जैसा कि भगवान अगले श्लोक में बताते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥