श्रीमद् भगवद्-गीता  »  अध्याय 3: कर्मयोग  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.21 
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
एक महान व्यक्ति जो भी कार्य करता है, सामान्य लोग उसका अनुसरण करते हैं। और वह अपने अनुकरणीय कार्यों से जो भी मानक स्थापित करता है, उसका अनुसरण पूरी दुनिया करती है।
 
Whatever conduct a great man follows, ordinary people follow that. The whole world follows the ideals he sets through his exemplary actions.
तात्पर्य
आम तौर पर सभी लोगों को ऐसे नेता की आवश्यकता होती है जो आचरण व व्यवहार से जनता को शिक्षा दे सकें। कोई ऐसा नेता जनता को धूम्रपान छोड़ने की शिक्षा नहीं दे सकता, जो स्वयं धूम्रपान करता हो। भगवान चैतन्य ने कहा कि शिक्षक को शिक्षा देने से पहले स्वयं आचरण करना चाहिए। जो इस तरह से शिक्षा देता है वे आचार्य अर्थात आदर्श शिक्षक कहलाता है। इसलिए एक शिक्षक को आम जन को सिखाने के लिए शास्त्र के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। शिक्षक प्रकट शास्त्रों के सिद्धांतों के विरुद्ध नियम नहीं बना सकता। मनु संहिता और इसी तरह के अन्य ग्रंथों को मानव समाज का अनुसरण करने वाले मानक ग्रंथ माने जाते हैं। इसलिए नेता की शिक्षा ऐसे मानक शास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए। जो स्वयं में सुधार करना चाहता है, उसे महान शिक्षकों द्वारा पालन किए जा रहे मानक नियमों का पालन करना चाहिए। श्रीमद्भगवतम् भी इस बात की पुष्टि करता है कि महान भक्तों के पदचिह्नों का पालन करना चाहिए और यही आध्यात्मिक प्राप्ति के मार्ग पर प्रगति का मार्ग है। राज्य का राजा या कार्यकारी प्रमुख, पिता और स्कूल शिक्षक सभी को सामान्य रूप से निर्दोष लोगों का स्वाभाविक नेता माना जाता है। ऐसे सभी प्राकृतिक नेताओं की अपने आश्रितों के प्रति एक बड़ी ज़िम्मेदारी है, इसलिए उन्हें नैतिक और आध्यात्मिक संहिताओं की मानक पुस्तकों से परिचित होना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)