हे धनंजय, भक्ति द्वारा सभी घृणित कर्मों को दूर रखो और उस चेतना में भगवान की शरण ग्रहण करो। जो लोग अपने कर्मों का फल भोगना चाहते हैं, वे कंजूस हैं।
O Dhananjaya! Stay away from all reprehensible actions through devotion and take refuge in God with the same feeling. Those who want to enjoy the fruits of their selfish actions are misers.
तात्पर्य
जो अपने आप को भगवान का नित्य सेवक समझता हैं वह वस्तुतः भगवान की भक्ति को छोड अन्य किसी प्रकार के कार्यों को करने की इच्छा नहीं रखता। जैसा कि पहले ही बताया जा चूका है कि बुद्धि योग का मतलब भगवान के प्रति प्रेम पूर्ण पारलौकिक सेवा है। ऐसा भक्ति पूर्ण कार्य जीव मात्र के लिए सही कार्य है। सिर्फ कंजूस ही अपने काम का फल भोगना चाहते है सिर्फ मात्र भौतिक बंधन में ही उलझे रहने के लिए। कृष्ण की भक्ति को छोडकर सभी काम ओछें कर्म है क्योंकि वह कर्ता को जन्म और मृत्यु के चक्र में बाँध देते है। इसलिए किसी भी प्रकार के कार्य का कारण कभी नहीं बनना चाहिए। सब कुछ कृष्ण की भक्ति में और कृष्ण की संतुष्टि के लिए ही किया जाना चाहिए। कंजूस यह नहीं जानते कि अपने द्वारा भाग्य या कठोर परिश्रम से अर्जित संपत्ति का उपयोग कैसे करें। कृष्ण की भक्ति में काम करके अपनी सारी शक्ति को लगाना चाहिए जो आपके जीवन को सफल बनाएगा। कंजूस की ही तरह भाग्य विहीन व्यक्ति अपने मानव ऊर्जा को भगवान की सेवा में नहीं लगाते।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)