vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्रीमद् भगवद्-गीता
»
अध्याय 18: संन्यास योग
»
श्लोक 45
श्लोक
18.45
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर
स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥
अनुवाद
अपने कर्म के गुणों का पालन करके प्रत्येक मनुष्य सिद्ध बन सकता है। अब कृपया मुझसे सुनिए कि यह कैसे संभव है।
Every person can become perfect by following the qualities of his own action. Now listen to me how this can be done.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×