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अध्याय 5: पुत्रदा एकादशी
 
 
 
भविष्योत्तर पुराणमें भगवान् श्रीकृष्ण तथा महाराज युधिष्ठिर के संवाद में पुत्रदा एकादशी के महात्म्य का वर्णन मिलता है ।
 
महाराज युधिष्ठिर ने पुछा, “हे श्रीकृष्ण ! कृपा करके मुझे पौष मास की शुक्ल पक्षकी एकादशी का वर्णन करे । उस व्रत की विधि क्या है ? तथा कौनसे देवताकी पूजा की जाती है ?"
 
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "जगत कल्याण के लिए इस एकादशी का मैं वर्णन करूँगा । अन्य एकादशी की तरह इस एकादशी को व्रत करे । इसे 'पुत्रदा' कहते है । सब पापों का हरण करनेवाली यह सर्वोत्तम तिथि है । कामना तथा सिद्धी को पूर्ण करनेवाले भगवान् इस तिथिके अधिदेवता है । पूरे त्रिलोकमें यह सबसे उत्तम तिथि है । "
 
" एक दिन घोडेपर सवार होकर महाराज सुकेतुमान गहरे वन में चले गये । पुरोहित और दूसरे लोगोंको इसकी कल्पना नही थी । पशु-पक्षियोंसे भरे हुए इस गहरे वन में महाराज भ्रमण कर रहे थे । दोपहर होते ही, महाराज को भूख और प्यास लगी । जल की तलाश में महाराज इधर-उधर घूम रहे थे । पूर्वजन्मके पुण्यसे उन्हे एक जलाशय दिखाई दिया । उस जलाशय के पास ही एक मुनिका आश्रम था ! अनेक शुभ शकुन होने लगे, उनकी बाँयी आँख और बायाँ हात फडकने लगा । शुभ घटना की आशा में राजा आश्रम में गये । उन्हें देखकर राजा को बहुत प्रसन्नता हुई । घोडे से उतरकर राजाने सभी मुनियोंको प्रणाम किया, तब उन मुनियोंने कहा, "हे राजन ! हम आपपर प्रसन्न है । "
 
राजा ने कहा, "हे मुनिगण ! आप कौन है ? आपके नाम क्या है? आप यहाँपर किस उद्देश्यसे एकत्रित हुए है ? कृपया हमे सत्य बताईये ।
 
मुनि ने कहा, "राजन ! हम विश्वदेव है । आजसे आनेवाली पाँचवी तिथिसे माघ मास प्रारंभ होगा । आज 'पुत्रदा एकादशी है । जो कोई भी यह एकादशी करता है उसे पुत्रप्राप्ति अवश्य होती है । "
 
राजा ने कहा, "विश्वदेवगण ! अगर आप मुझपर प्रसन्न है तो मुझे कृपया पुत्रप्राप्ति हो !"
 
मुनिने कहा, "राजन ! आज 'पुत्रदा एकादशी है । आज आप इसका पालन करे, भगवान केशव के प्रसादरूप आपको पुत्रप्राप्ति होगी । "
 
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “हे युधिष्ठिर ! इस प्रकार मुनियोंके कहनेपर राजाने एकादशी व्रत किया । द्वादशी को व्रत संपूर्ण करके (पारण करके) मुनियोंका आशिर्वाद लेकर राजा वापस आया । उसके पश्चात् राणी गर्भवती हुई और एकादशी के पुण्य से राजाको तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई । जिसने अपने उत्तम गुणोंसे अपने पिताको संतोष दिया, वह उत्तम प्रजापालक था । इसलिए, हे राजन! 'पुत्रदा' व्रत अवश्य करना चाहिए । जो कोई भी इस व्रतका पालन करता है उसे पुत्रकी प्राप्ति होकर वह मनुष्य स्वर्गप्राप्त करता है ।"
 
" जो इस व्रत की महिमा पढेगा, सुनेगा या कहेगा उसे अश्वमेध यज्ञ के फल की प्राप्ति होगी ।"