एकादशी कथा  »  अध्याय 25: उत्थान एकादशी  » 
 
 
अध्याय 25: उत्थान एकादशी
 
 
 
स्कन्द पुराणमें ब्रह्मदेव तथा नारदमुनी के संवादोंमे उत्थान अथवा प्रबोधिनी एकादशी की महिमा कही गयी है ।
 
एकबार ब्रह्मदेव देवर्षि नारद को कहने लगे, " हे ऋषिवर! सभी को पुण्य, आनंद और मोक्ष प्रदान करनेवाली उत्थान एकादशी के बारे में मै तुम्हे कहता हूँ । कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में यह एकादशी आती है। इस एकादशी के पालन से मिलनेवाला पुण्य सहस्र अश्वमेध यज्ञ या सौ राजसूय यज्ञ करके मिलनेवाले पुण्य से भी कई गुना अधिक है । "
 
यह सुनने के पश्चात नारदजीने पूछा, "हे पिताश्री ! एक समय खाने से अथवा पूर्ण उपवास करके प्राप्त होनेवाले फल के विषय में कृपया आप बताईये।
 
ब्रह्मदेव ने कहा, "एकादशी को एक समय खानेसे उसके केवल एक जन्म के पाप नष्ट होते है। जो केवल रसाहार करता है उसके दो जन्मोंके पापोंका नाश होता है। पर जो पूरा दिन उपवास करता है उसके सात जन्मों के पाप नष्ट होते है ।"
 
" हे पुत्र ! उत्थान एकादशी के पालन से त्रिभुवन में अनिश्चित, न मिलनेवाला और बहुत ही दुर्लभ ऐसा पुण्य प्राप्त होता है। मंदार पर्वत के समान पाप भी इस व्रत के प्रभाव से नष्ट हो जाते है । इस दिन के पुण्य की तुलना सिर्फ सुमेरु पर्वत से ही की जा सकती है। जो विष्णु की भक्ति नही करते, परस्त्री भोग करते है, जो नास्तिक है, वेदोंका अपमान करते है, जो मूर्ख है उनके लिए धार्मिक तत्त्व का प्रश्न ही नही आता । इसीलिए किसी को भी पाप नही करना चाहिए सिर्फ पुण्य कर्म ही करना चाहिए। पुण्य कर्मों में लगने से धार्मिक तत्त्वों का नाश नहीं होता। जो भी निश्चयपूर्वक उत्थान एकादशी का पालन करता है उसे सौ जन्मोंके पापों से मुक्ति मिलती है। जो भी रात को जागरण करता है उसके भूत - वर्तमान- भविष्य की पिढियाँ वैकुंठ प्राप्त करती है।
 
हे नारद! जो भी कार्तिक मास में विष्णुकी पूजा तथा एकादशी व्रत का पालन नही करता उसके सभी पुण्यों का क्षय होता है। इसीलिए निश्चितरूपसे हर एक को कार्तिक मास में विष्णु की उपासना करनी चाहिए। इस मास में अन्यद्वारा बनाया अन्न न खाने से चंद्रायण व्रत का पुण्य मिलता है । कार्तिक मास में जो भी भगवान् विष्णु के गुणोंका, लीला का श्रवण करता है उसे १०० गाय दान करने का पुण्य प्राप्त होता है। नियमित वैदिक शास्त्रों का अध्ययन करनेसे हजारों यज्ञों का फल मिलता है । जो भगवद्- कथा के श्रवण के पश्चात वक्ता को दक्षिणा देता है उसे वैकुंठ की प्राप्ति होती है।
 
नारदमुनि ने कहा, “हे स्वामी! कृपया यह एकादशी कैसी करनी चाहिए इस विषय में आप हमें बताईये ।
 
पितामह ब्रह्मदेव ने कहा, "हे द्विजश्रेष्ठ ! प्रातः काल स्नान के पश्चात भगवान् केशव की उपासना करे। इस तरह व्रत धारण करे कि, 'हे अरविंदाक्ष! एकादशीको मैं अन्न ग्रहण नही करूँगा । केवल द्वादशी को ही अन्न ग्रहण करूँगा । हे अच्युत ! कृपया आप मेरी रक्षा करे ।
 
ब्रह्मदेव ने आगे कहा, "संपूर्ण दिन भक्तिभावसे व्रत का पालन करना चाहिए। रातमें भगवान् विष्णु के पास बैठकर भजन-कीर्तन - लीला का श्रवण करके जागरण करना चाहिए । एकादशी दिन लोभ की वृत्ति का त्याग करना चाहिए । जो भी पुण्यवान इस प्रकार से व्रत का पालन करता है, उसे अंतिम ध्येय की प्राप्ति होती है । जो कोई भी इस दिन भगवान जनार्दन को कदंब के फूल अर्पण करता है, उसे कभी यमलोक नही जाना पडता । जो गरुडध्वज भगवान विष्णुको कार्तिक मास में गुलाब के फूल अर्पण करता है उसे निश्चित ही मुक्ति प्राप्त होती है। जो कोई भी अशोक वृक्ष के फूल भगवान् को अर्पण करता है उसे सूर्य-चंद्र होने तक दुख भोगना नही पडता । शमी वृक्ष के पत्तों से जो भगवान् की पूजा करता है, उसे यमराज कभी दंड नही देते। वर्षाऋतु में जो जगदीश्वर विष्णुकी पूजा चंपक फूलों से करता है उसका भौतिक विश्वमें जन्म नही होता। जो पीले रंग के केतकी के फूलों से भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह करोड़ों जन्म में किए हुए पापों से मुक्त होता है । सहस्र दल लाल रंग के कमल के फूलों से जो भगवान जगन्नाथ की पूजा करते है, वह भगवान् के श्वेतदीप नामक धाम की प्राप्ति करते है ।
 
हे द्विजश्रेष्ठ ! एकादशी के रात को जागरण करना चाहिए। द्वादशी के दिन विष्णु की पूजा करके ब्राह्मणकों भोजन खिलाकर व्रत पूर्ण करे। अपनी क्षमता के अनुसार आध्यात्मिक गुरु की पूजा करके उन्हे योग्य दक्षिणा देनी चाहिए। इससे भगवान् प्रसन्न होते है।