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अध्याय 24: रमा एकादशी
 
 
 
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आनेवाली रमा एकादशी का महात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराणमें श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर के संवादों में वर्णन हुआ है ।
 
एक बार युधिष्ठिर महाराजने पूछा, "हे जनार्दन ! कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आनेवाली एकादशी का नाम और महात्म्य कृपया विस्तारसे वर्णन करे । "
 
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "नृपेंद्र, सब पाप नाशनी इस एकादशी को 'रमा' कहते है । बहुत वर्ष पहले मुचुकुंद नामका राजा था। उसकी देवराज इंद्र से अच्छी मित्रता थी । वरुण, कुबेर, यमराज, अग्नि ये भी उसके अच्छे मित्र थे। सभी धार्मिक तत्त्वों का पालन करते हुए वह अपने प्रजापर राज्य कर रहा था।
 
कुछ वर्षों के बाद राजा को पुत्री हुई जिसका नाम चंद्रभागा रखा गया। योग्य समय के उपरांत उसका विवाह चंद्रसेन राजा के पुत्र शोभन से हुआ। एक बार शोभन अपने ससुराल आया था, उसी दिन ही एकादशी थी। चंद्रभागा घबराकर विचार करने लगी, "हे भगवान ! अब क्या होगा? मेरे पति बहुत ही कमजोर है, उनसे भुख सहन नही होती। मेरे पिताश्री बहुत ही कठोर है। दशमी के दिन ही अपनी प्रजा में सेवकोंको भेजकर एकादशीको अन्न कोई भी नही खाए यह आदेश देते है । "
 
शोभन ने इस नियम के बारे में सुना और पत्नी को कहा, "हे प्रिये ! अब मैं क्या करूँ ? मेरे प्राण बचाने के लिए और राजाज्ञा को मानने के लिए मुझे क्या करना चाहिए ?"
 
चंद्रभागाने कहा, "हे स्वामी! मनुष्य तो क्या हाथी, अश्व तथा अन्य प्राणियोंको भी आज हमारे पिताजी के साम्राज्य में कुछ भी खाने नहीं दिया जाता। अगर आपको कुछ खाना है तो आपके घर आपको लौटना पडेगा । इसीलिए योग्य विचार करके आप उचित निर्णय लीजिए।'
 
अपनी पत्नी की बात सुनकर शोभनने कहा, “तुमने सत्य कथन किया है। परंतु आज एकादशी व्रत करनेकी मेरी इच्छा है, मेरे भाग्य में जो होगा वही होगा । "
 
इस प्रकार सोचकर शोभनने उस दिन एकादशी व्रत किया । पर भूख-प्यास से वह व्याकुल होने लगा। सूर्यास्त के समय धर्मपरायण जीवात्मा और वैष्णव प्रसन्न हुए । भगवान् के नामसंकीर्तनमें उन्होंने रातभर जागरण किया । परंतु भूख के कारण शोभनने अपना शरीर त्याग दिया। सूर्योदय के पूर्व ही मुचुकुंद राजाने शोभन के शरीर का अंतिम संस्कार भी कर दिया। लेकिन चंद्रभागा को सती जाने की अनुमति नही दी । पती के श्राद्ध के पश्चात चंद्रभागा अपने पिता के घर रहने लगी।
 
रमा एकादशी के पालन से शोभन मंदार पर्वत के शिखरपर बसनेवाले देवपुरी राज्य का राजा बना । रत्नों से सुशोभित सुवर्ण के खंबे और अमूल्य हीरेमोतीयोंसे जडित राजभवनमें वह रहने लगा। अनेक आभूषणोंसे युक्त शोभन बहुत सारे गंधर्व और अप्सराओं के द्वारे सेवित था ।
 
मुचुकुंदपुर का सोमशर्मा नामक ब्राह्मण तीर्थों की यात्रा करते हुए अचानक एक दिन देवपुरी में पहुँचा। शोभनको अपने राजा का जामाता समझकर वो उनके पास गया । ब्राह्मणको अपने सामने देखकर राजा अपने सिंहासन से उठे और प्रणाम करके ब्राह्मण के सामने खडे रहे । उसके पश्चात राजाने ब्राह्मण का, राजा मुचुकुंद का, चंद्रभागा तथा मुचुकुंदपुर की प्रजाका कुशल-मंगल पूछा। सभी लोग सुखसे और शांतिसे रह रहे है ऐसा ब्राह्मणने उत्तर दिया। आश्चर्यसे ब्राह्मणने राजा को पूछा, "हे राजन् ! इतनी सुंदर नगरी मैंने कभी नही देखी। ऐसा राज्य आपको कैसे प्राप्त हुआ, इस विषय में आप हमें बताईए । "
 
तभी राजाने कहा, " रमा एकादशी का व्रत करनेसे यह अशाश्वतराज्य मुझे मिला है। लेकिन ये राज्य किस प्रकार शाश्वत होगा इस विषय में आप मेरा मार्गदर्शन करे । शायद अश्रद्धा से मैंने इस व्रत का पालन किया होगा । इसीलिए यह अशाश्वत राज्य मुझे मिला है। कृपया आप सब ये चंद्रभागा को कहिए। मेरे मत के अनुसार केवल वह इस राज्यको शाश्वत बना सकती है।
 
यह सुनकर वह ब्राह्मण मुचुकुंदुपरी में लौट आया। चंद्रभागा को पूरा वृत्तांत कथन किया। सब सुनकर चंद्रभागाने कहा, "हे ब्राह्मणदेव ! आप जो भी कुछ कह रहे है वो मुझे केवल एक स्वप्न के भांति प्रतीत हो रहा है। " ब्राह्मणने कहा, "हे राजकन्ये ! मैंने स्वयं तुम्हारे पतिको देवपूरी में देखा है। उसका राज्य सूर्य के समान तेजस्वी है । उस राज्य को शाश्वत बनाने की बिनती तुम्हारे पतिने की है ।" चंद्रभागा ने कहा, “हे ब्राह्मण! मै अपने पुण्य के प्रभावसे वो राज्य शाश्वत बना दूँगी। आप मुझे वहाँ ले चलिए । अलग हुए दोनोंको पुनः मिलानेका पुण्य आपको प्राप्त होगा । "
 
उसके पश्चात सोमशर्मा ब्राह्मणने चंद्रभागाको मंदार पर्वत पर वामदेव के आश्रममें ले गए और उन्हें पूरा वृत्तांत सुनाया । वामदेवने चंद्रभागाको वैदिक मंत्र की दीक्षा दी । वामदेव से प्राप्त मंत्र के प्रभावसे तथा रमा एकादशी के पालन से चंद्रभागाको दिव्य शरीर प्राप्त हुआ। उसके बाद वह अपने पतिके सामने गई ।
 
अपनी पत्नी को देखते ही शोभन को प्रसन्नता हुई। चंद्रभागाने कहा, “कृपया आपके हित के लिए मेरे दो वचनोंको सुनिए। अपने आठ वर्ष की आयु से मैं रमा एकादशी का पालन कर रही हूँ । इस व्रत पालन के प्रभाव से आपका राज्य प्रलयतक शाश्वत और समृद्ध रहेगा।” उसके बाद वह अपने पति के साथ आनंदपूर्वक रहने लगी । इसीलिए हे राजन ! रमा एकादशी ये कामधेनू अथवा चिंतामणीसमान सभी की सभी इच्छाएँ पुर्ती करनेवाली है । "
 
भगवान् श्रीकृष्ण ने आगे कहा, "हे राजन् ! इस प्रकार मैंने तुम्हें इस एकादशी के महात्म्य का कथन किया है । कृष्ण पक्ष की तथा शुक्ल पक्ष की दोनों भी एकादशी का व्रत पालन करनेवाले को मुक्ति मिलती है । जो भी इस व्रत की महिमा सुनता है वह सभी पापोंसें मुक्त होकर आनंद से वैकुंठ की प्राप्ति करता है ।