एकादशी कथा  »  अध्याय 2: उत्पन्ना एकादशी  » 
 
 
अध्याय 2: उत्पन्ना एकादशी
 
 
 
उत्पन्ना एकादशी का महात्म्य भविष्योत्तर पुराणमें भगवान् श्रीकृष्ण अपने सखा अर्जुन को बताते है ।
 
नैमिष्यारण्यमें एकत्रित हुए सभी ऋषियोंको सूत गोस्वामी बताते हैं, “भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको बताये अनुसार जो नियमपूर्वक एकादशीव्रत करता है, उसे इस जन्ममें आनंद और अगले जन्ममें वैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है ।"
 
एक बार अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन ! एकादशी के दिन पूरा उपवास करने से या केवल रात को खाने से या केवल दोपहर में प्रसाद लेनेसे क्या लाभ मिलता है ?"
 
तब भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "हे अर्जुन ! हेमंत ऋतु के प्रारंभ के मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष की एकादशी करनी चाहिए । प्रातः काल उठकर इस का प्रारंभ करे । दोपहर में स्नान करके शुद्ध होना चाहिए । स्नान करते हुए पृथ्वीमाता की इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए ।
 
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे ।
 
मृत्तिका हर मे पापं यन्मया पूर्वसंचितम् ॥
 
" है अश्वक्रान्ते ! हे रथक्रान्ते ! हे विष्णुक्रान्ते ! हे वसुंधरे ! हे मृत्तिके ! हे पृथ्वीमाता ! पूर्वजन्मों के मेरे सभी पापोंको नष्ट कर दो, जिससे मैं उच्चध्येय ( भगवत् धाम ) की प्राप्ति कर सकूं ।"
 
उसके बाद भगवान श्रीगोविंद की पूजा करनी चाहिए ।
 
एक बार देवराज इंद्र सब देवताओं के साथ श्रीविष्णु के पास गये और इस तरह प्रार्थना करने लगे, "हे जगन्नाथ ! हे पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान्! हमारा प्रणाम स्वीकार करें । आप सबके आश्रय है। आपही सबके माता-पिता है । आप सभीका सृजन, पालन, विनाश करनेवाले है । आप धरती, आकाश समेत सभी ब्रह्मांडों का हित करनेवाले है। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं । यज्ञ, तपस्या और वैदिक मंत्रोके स्वामी तथा भोक्ता आप है । इस जगत में ऐसी कोई भी ( चराचर) वस्तु नहीं जिसपर आपका नियंत्रण न हो । संपूर्ण जगत के चर-अचर वस्तु के स्वामी तथा नियंत्रक आप ही है । हे पूर्ण पुरूषोत्तम ! हे देवेश्वर! हे शरणागत वत्सल ! हे योगेश्वर ! दानवोंने सभी देवताओंको स्वर्गसे भगा दिया है और भय से उन्होंने आपके चरणोंकी शरण ली है । कृपया उनकी रक्षा करें । हे जगन्नाथ ! स्वर्ग से इस भूलोकपर पतन होकर हम इस दुःखसागर में डूब रहे है । कृपया हम पर आप प्रसन्न होईये । "
 
इस प्रकार इंद्रकी दया की प्रार्थना सुननेपर भगवान् श्रीविष्णुने पूछा, "ऐसा कौनसा अविजयी दानव है, जिससे देवता पराजित हो रहे है ? उसका नाम क्या है ? उसके शक्तिका स्रोत क्या है ? हे इंद्र, निर्भय होकर सभी जानकारी हमें कहो ।"
 
इंद्र ने कहा, "हे देवेश्वर ! हे भक्तवत्सल ! हे पुरूषोत्तम ! देवताओं में भय और चिंता निर्माण करनेवाला असुर नंदीजंघ ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न हुआ है । उसके जैसा ही उसे बलशाली और कुप्रसिद्ध मूर नामका बेटा है । चंद्रावती नाम का भव्य नगर मुर राक्षसकी राजधानी है ! इसी मुर राक्षसने सब देवताओंको स्वर्गसे निकालकर स्वयं वहाँ निवास कर रहा है । इंद्र, अग्नि, चंद्र, वरूण, यम, वायु और ईश ये सभी देवताओंके अधिकार उसने छीन लिए है । हम सब देवता मिलकर भी उसे पराजित नहीं कर सके। हे विष्णु ! आप कृपया उसका अंत करके देवताओं की रक्षा कीजिए ।"
 
इंद्र के यह शब्द सुनते ही देवताओंको कष्ट देनेवाले मुर राक्षस के प्रति श्रीविष्णुको क्रोध आया और वे कहने लगे, "हे देवराज ! मैं स्वयं उस शाक्तिशाली दानव का वध करूँगा । आप सब चंद्रावती नगर चलिए । " सब देवता भगवान के कहे अनुसार चंद्रावती नगरी में जाकर अनेक प्रकार के शस्त्र जमा करने लगे ।
 
दानवोंके सामर्थ्य से पहले ही सभी देवता भयभीत थे । पर अब भगवान श्रीविष्णु के नेतृत्व में निर्भय होकर देवता रणभूमि में पहुँचे । उन्हें देखकर राक्षस क्रोधित हो गये । भगवान् ने सभी असुरोंको पराजित किया, परंतु मुर को पराजित करना कठिन लगने लगा। अनेक अस्त्र-शस्त्र का उपयोग करनेपर भी भगवान् मुर राक्षस को मार नहीं सके। दस हजार वर्ष तक दोनोंमें बाहुयुद्ध चला, अंतमें मुर राक्षसको पराजित करके भगवान बद्रिकाश्रममें हेमवती नामक गुफामें विश्राम करने पधारे ।
 
भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे, "हे अर्जुन ! उस असुरने गुफातक पीछा करके उसमें प्रवेश किया और श्रीविष्णु को निद्रावस्था में मारने का विचार किया। उस समय उनके शरीरसे एक तेजस्वी कन्या बाहर निकली।
 
वह शस्त्रोंसे परिपूर्ण थी, उसने मुर राक्षसे बहुत समयतक युद्ध करके उसका वध किया । शेष दानव भयभीत होकर पाताल लोकमें गये । श्रीविष्णु ने निद्रासे जागकर मूर राक्षस का शव और उनके सामने हाथ जोडके खडी हुई कन्या देखी तो आश्चर्यसे पूछने लगे, "तुम कौन हो ?"
 
उस देवीने उत्तर दिया, “हे भगवान ! मैं आपके शरीरसे उत्पन्न हुई हूँ और इस असुरका मैने वध किया है ! आपको निद्रावस्था में देखकर मारने के लिए आनेवाले इस असुर का मुझे वध करना पडा !"
 
भगवान श्रीविष्णुने कहा, "हे देवी! आपके इस कार्य से मैं प्रसन्न हूँ । तुम मनचाहा वरदान माँग लो ।” जब देवीने वरदान मांगा तब भगवान् श्रीविष्णु ने कहा, “तुम मेरी आध्यात्मिक शक्ती हो, एकादशी दिन उत्पन्न होने के कारण तुम्हारा नाम एकादशी होगा । जो भी एकादशी व्रत करेगा उसे अक्षय सुख की प्राप्ति होगी । "
 
"उस दिन से एकादशी दिन विश्वमें पवित्र दिन जाना जाता है । हे अर्जुन ! जो इसका पालन करेगा उसे मैं परम (उच्च) गति प्रदान करता हूँ ! हे अर्जुन ! एकादशी और द्वादशी एक ही तिथि में होनेपर उस एकादशीको सर्वोच्च माना गया है । एकादशी दिन मैथुन, अन्न, मद्य, मांस, रसोई में कास्य के बर्तन, शरीरको तेल लगाना वर्जित है । जो इसका महात्म्य जानकर व्रत करेगा उसे अधिक फलप्राप्ति होगी।