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अध्याय 17: शयन एकादशी
 
 
 
भविष्योत्तर पुराणमें शयन अर्थात पद्मा अर्थात देवशयनी एकादशी का महात्म्य श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर के संवादोंमें विस्तृत रूपसे कहा गया है ।
 
एक बार युधिष्ठिर महाराजने श्रीकृष्ण को पूछा, "हे केशव ! आषाढ मास के शुक्ल पक्ष में आनेवाली एकादशी का नाम क्या है ? इस दिन के देवता कौन है ? इस व्रत के पालन की विधि क्या है ? इस बारे में विस्तार से आप कहिये ।"
 
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "हे भूपाल ! एक बार वाक्कुशल देवर्षि नारदने ब्रह्मदेवको यही प्रश्न पूछा । उसपर ब्रह्मदेवने उत्तर दिया, "इस संसार में एकादशी के व्रतसमान पुण्य प्रदान करनेवाला कोई भी व्रत नही । सभी पापोंसे मुक्त होने के लिए हरएक को इस व्रतका पालन करना चाहिए। जो इस व्रतका पालन करता है वह कभी भी नरक प्राप्त नही करता । आषाढ मास के शुक्ल पक्ष में आनेवाली एकादशी को शयन अथवा देवशयनी या पद्मा एकादशी कहते है । इस दिनके अधिष्ठाता भगवान् हृषिकेश है। इसलिए उनके प्रसन्नता के लिए इस व्रतका पालन करना चाहिए ।"
 
ऐसा कहा जाता है कि पूर्व समय में रघुवंश में जन्में मांधता नामक राजा पृथ्वीपति थे। सत्यवादी राजाओंके वह अग्रणी थे । साथ ही बहुत बलवान, पराक्रमी थे और प्रजा का पालन अपनी संतान की तरह करते थे। इस पुण्यवान राजा के राज्य में कभी बाढ, सूखा नही था साथ में कोई भी बीमारी नही थी । इससे सभी प्रजा प्रसन्नचित्त और सुखपूर्वक रहती थी । राजाके कोषमें अन्याय से लिया हुआ थोडा भी धन नही था । इस प्रकार से राजा और प्रजा दोनोंही आनंद से दिन गुजार रहे थे।
 
कुछ वर्षो पश्चात दैव से अथवा किसी पाप कर्मसे, तीन वर्षोतक लगातार वर्षा नही हुई । धान के अभाव में लोग भूखे मरने लगे, यज्ञ करना बंद हो गया। सभी दुःखसे व्याकुल होकर राजासे बीनती करने लगे, "हे राजन ! कृपया हमारी सुने ! वेदोंमें जलको 'नर' कहते है और 'अयन' मतलब अधिष्ठान, वास्तव्य । इसीसे भगवान् का एक नाम नारायण है। जो हमेशा जलमें वास्तव्य करता है वह वर्षा का मूल कारण है । वर्षासे अनाज होता है, अन्न से सबका पोषण होता है । इसीलिए, हे राजन् ! आप कुछ उपाय करे जिससे सब जगह पुनः शांती और सुख की स्थापना हो ।
 
राजाने कहा, “आपने जो कहा वह सत्य है । अन्न पूर्ण ब्रह्म है। सभी अन्न पर आश्रित है। वेदों और पुराणोंमें कहा गया है कि, राजा ने किए हुए पाप के कारण यह परिस्थिती निर्माण होती है । पर मुझे ज्ञात नही हो रहा है कि मुझसे ऐसा कौनसा पाप हुआ है, उससे यह परिस्थिती निर्माण हुई है। फिर भी अपने प्रजा के हित के लिए मै प्रयास करुँगा।"
 
ऐसा कहकर अपने मुख्य अधिकारी और सैनिकोंके साथ ब्राह्मणोंकों को प्रणाम करके राजाने वनमें प्रवेश किया । वनमें भ्रमण करते हुए उन्होंने अनेक आश्रमोंको भेट दी और एक दिन सौभाग्यसे उन्हे अंगीरामुनि मिले। अंगीरामुनि ब्रह्माजीके पुत्र थे और बहुत तेजस्वी थे । जितेंद्रीय राजा मंदतने उन्हे देखकर प्रणाम किया और हाथ जोडकर उनसे प्रार्थना की और मुनिने भी राजाको आशीर्वाद दिया ।
 
उसके पश्चात ऋषिनें राजा के आगमन हेतु की विचारणा की, प्रजा के बारे में पूछा। राजाने कहा, “हे भगवन् ! मै धर्मनिष्ठा से राज करता हूँ, फिर भी मेरे राज्य में वर्षा नही हुई। इससे मेरी प्रजा बहुत दुःखी है । इसका कारण क्या है यह मुझे समझ में नही आ रहा है। कृपया मेरे प्रजा में सुखसमृद्धी किस प्रकार आयेगी इस विषय में आप मुझे कहिए। "
 
अंगिरामुनि कहने लगे, "हे राजन! वर्तमान युग सत्ययुग है । सभी युगोंमे ये सर्वश्रेष्ठ है परंतु इस युगमें केवल ब्राह्मणोंको तपस्या करनेका अधिकार है। परंतु तुम्हारे राज्यमें एक शुद्र तपस्या कर रहा है उसीकी तपस्या से तुम्हारे राज्यपर यह परिस्थिती आई है । इसलिए तुम्हे उस शुद्रको मारकर प्रजा में सुखसमृद्धि लानी चाहिए।"
 
राजाने कहा, "हे ऋषिवर ! तपस्या में मग्न निष्पाप व्यक्ति को मारना असंभव है। कृपया आप मुझे अन्य सुलभ उपाय बताएँ ।"
 
अंगीरामुनि ने उत्तर दिया, "इस परिस्थिती में पवित्र पद्मा या देवशयनी अर्थात शयन् एकादशी का पालन आपको तथा आपकी प्रजाको करना चाहिए। इसके पालन से राज्य में वर्षा होगी। यह एकादशी आषाढ मास के शुक्ल पक्ष में आती है । इस व्रत के पालन से व्यक्ती सभी पापोंसे मुक्त होता है और उसके अंतिम ध्येयप्राप्ती के मार्ग की रुकावटे दूर हो जाती है । हे राजन् ! तुम्हें अपने परिवार और प्रजा के साथ इस व्रत का पालन करना चाहिए ।"
 
अंगीरामुनि के वचन सुनकर राजा अपने राज्य लौट आये। सभी ने आषाढ मास की एकादशी के व्रत का पालन किया। इस व्रत के प्रभाव से राज्य में सब जगह वर्षा हुई। राज्य में सुखसमृद्धी से सारी प्रजा प्रसन्न हो गई। इस व्रत के पालन से भगवान् हृषिकेश प्रसन्न होते है और व्रत करनेवाले के कथन अथवा श्रवण करनेसे सभी पाप नष्ट हो जाते है।
 
इस एकादशी को विष्णु शयनी एकादशी भी कहते है । भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिए वैष्णव इस व्रत का पालन करते है । अन्य भौतिक भोंगो के लिए नही, अपितु उनकी शुद्ध भक्ति की प्राप्ति के लिए वैष्णव प्रार्थना करते है। इस एकादशी से ही चार्तुमास व्रत प्रारंभ होता है । इसी दिन से भगवान् शयन करते है । इस काल से उनके उठने तक चार महीने उनके गुणों का श्रवण, कीर्तन करके वैष्णव इस व्रत का पालन करते है ।
 
युधिष्ठिर महाराजने फौरन श्रीकृष्ण को पूछा, “भगवान ! किस प्रकार इस विष्णुशयन व्रतका अर्थात् चातुर्मास का पालन करना चाहिए । कृपया इस बारे में आप कहिए ।"
 
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "हे राजन् ! जब सूर्य कर्कराशि में प्रवेश करता है उस समय अखिल ब्रह्मांड के पालक भगवान मधुसूदन शयन करते है । जिस समय सूर्य तुला राशिमें प्रवेश करता है उस समय भगवान निद्रा से जाग जाते है । शयन एकादशी से चातुर्मास प्रारंभ होता है। हे युधिष्ठिर महाराज ! प्रातः उठकर स्नान के पश्चात भगवान विष्णु को पीतांबर पहनाना चाहिए।'
 
भगवान के लिए सफेद चादर का बिछाना लगाना चाहिए। भगवान् को पंचामृत का अभिषेक करके उन्हे पोछकर चंदन का लेप लगाना चाहिए। धूप, दीप, फूल अर्पण करके उनकी पूजा करनी चाहिए और उन्हे सुलाना चाहिए।
 
चातुर्मास का प्रारंभ हम एकादशी, द्वादशी, पूर्णमासी, अष्टमी या संक्राती (सूर्य कर्क राशीमें प्रवेश करता है उस दिन से) से कर सकते है । कार्तिक मास की द्वादशी को चातुर्मास व्रत का समाप्त होता है । जो व्यक्ति चातुर्मास व्रत धारण करता है वह भगवान् का स्मरण करते हुए सूर्य के समान तेजस्वी विमान में बैठकर भगवान् के धाम जाता है । जो व्यक्ति चातुर्मास में भगवान् के मंदिर की, आगे के आंगन का मार्जन करता है, पेड और लताओंसे सुशोभित करता है उसे सात जन्म आनंद की प्राप्ति होती है । साथमें भगवान् को घी का दीपक अर्पण करनेसे व्यक्ति समृद्ध और भाग्यशाली बनता है । जो व्यक्ति मंदिरमें प्रातः, संध्या और दोपहरमें गायत्री मंत्र का जप १०८ बार करता है वह पापमय कार्य में रत नही होता व्यासदेव उस व्यक्तिपर प्रसन्न होते है और उसे विष्णुलोक की प्राप्ति होती है । जो व्यक्ति विद्वान ब्राह्मण को २८ अथवा १०८ मिट्टी के बर्तन भरके तिल दान करता है, वह काया, वाचा व मन से किये हुए सभी पापोंसे मुक्त होता है।
 
भगवान् जनार्दन जब तक निद्रामें रहते है, उस समय तक व्रतधारी व्यक्ति को पलंगपर नही सोना चाहिए । चार महिना मैथुन नही करना चाहिए। दिनमें एकबारही अन्न ग्रहण करनेका अथवा बिना परिश्रम जो कुछ भी प्राप्त उसे खाना यह व्रत धारण करना चाहिए। चातुर्मास में जो कोई भी भगवान् विष्णु के सामने गायन करता है उसे गंधर्व लोक की प्राप्ति होती है । जो गुड का त्याग करता है उसे पुत्रपौत्र की प्राप्ति होती है । तेल वर्ज्य करने से व्यक्ति रूपवान होता है, उसके सभी शुत्रओंका नाश होता है। जो व्यक्ति अपनी खुशी के लिए फूलोंका उपयोग नही करता उसे विद्याधर लोक की प्राप्ति होती है । पान खाना वर्जित करनेसे व्यक्ति निरोगी होता है । भगवान् श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए जो दही-दूध का त्याग करता है उसे गोलोक की प्राप्ति होती है। जो नाखून अथवा केश नही काटता उस व्यक्तिको भगवान् के चरणकमलों को स्पर्श करनेका पुण्य मिलता है । जो भगवान् के मंदिर की परिक्रमा करता है वह हंसविमान में सवार होकर भगवद्धाम को जाता है ।