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अध्याय 16: योगिनी एकादशी
 
 
 
आषाढ मास के कृष्ण पक्षमें आनेवाली योगिनी एकादशी का महात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराणमें भगवान् श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर महाराज के संवाद में वर्णित है ।
 
एक बार युधिष्ठिर महाराजने भगवान् श्रीकृष्ण को पूछा, "हे भगवान! आषाढ मास के कृष्ण पक्ष में आनेवाली एकादशी का संबोधन क्या है ?"
 
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "हे राजन् ! इसको योगिनी एकादशी कहते है । इसके पालनसे व्यक्ति गंभीर पापकर्म और भवसागर से मुक्ति पाता है ।"
 
“हे नृपश्रेष्ठ ! अब मैं एक सुंदर कथा कहता हूँ । अलकापुरी के राजा महाराज कुबेर शिवजीके अनन्य भक्त थे । हेम नामका यक्ष उनका माली था । उसकी पत्नी विशालाक्षी बहुत सुंदर थी और यक्ष हेम विशालाक्षी पर बहुत आसक्त था । मानस सरोवर से सुंदर फूल इकठ्ठा करके वह फुल हेम कुबेर को देता था । कुबेर उन सुंदर फूलोंका उपयोग शिवजी के उपासना हेतु करते थे । एक दिन हेमने सुंदर फूल इकठ्ठा किये, पर वह कुबेर को न देकर ही पत्नी के प्रेम के कारण घर में रखके उसके साथ ही रहा।
 
फूलोंके अभाव के कारण की पूजा संपन्न न हो सकी। छह घंटे प्रतीक्षा के पश्चात कुबेर को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने अपने एक सैनिक को माली के पास भेजा । हेम माली के पास से लौटते ही कुबेर को उस सैनिकने कहा, हेम माली घर में अपने पत्नी का संग कर रहा है ? ये सुनने के पश्चात कुबेरने हेम मालीको अपने पास लाने का आदेश दिया। अपनी भूलको जानकर हेमने कुबेरके सामने आते ही साष्टांग प्रणाम करके हाथ जोडकर खड़ा रहा। क्रोधित कुबेरने उसे कहा, "हे मूर्ख । आध्यात्मिक (धार्मिक) तत्त्वोंका खंडन करनेवाले महापापी व्यक्ति ! अपनी पत्नी के आसक्ति के कारण आज तुमने मेरे प्रिय आराध्य महादेवजी का अपराध किया है । ये केवल तुम्हारे इंद्रियभोग के कारण हुआ । इसलिए तुम्हे कोढ हो यह मै शाप देता हूँ, जिससे इसके आगे तुम अपनी पत्नी से हमेशा दूर रहोगे । मूर्ख ! फौरन इस जगह से निकल जाओ।
 
कुबेर के इस श्रापसे हेम मालीका अलकापुरीसे पतन होकर इस मृत्यु लोकमें जन्म हुआ। थोडे काल बाद उसे कोढ हुआ । उस दुखसे वह परेशान था। भूख, प्यास और परेशानी से व्याकुल होकर वह वन में गया और बहुत रात-दिन उसने इसी तरह गुजारे । दिनभर उसे सुख नही मिलता तो रात को उसे निद्रा नही आती। इसी तरह उसने अनेक सर्दी-गर्मी के वर्ष निकाले। पिछले जन्ममें शिवजीकी उपासना में सहायता करने के कारण उसे अपने पिछले जन्म का स्मरण था और अनेक पापकार्यों में मग्न होते हुए भी उसकी चेतना शुद्ध और सावधान थी ।
 
भ्रमण करते - करते एक दिन वह मेरु पर्वत पर पहुँचा । वहाँपर उसने महान तपस्वी मार्कण्डेयजी को देखा, जिनकी आयु ७ कल्प ( ब्रह्माके दिन ) है | उन्हे देखकर दूर से ही उसने अनेक बार साष्टांग प्रणाम किया। तो दयावान, करुणावान मार्कण्डेय ऋषिने उसे अपने समीप बुलाकार पुछा, “तुमने ऐसा कौनसा महापाप किया है जिससे तुम्हे यह रोग हुआ है ?"
 
ये सुनने के पश्चात हेम मालीने सभी वृत्तांत उन्हे कहा और पूछने लगा, “हे ऋषिवर ! गत जन्मों के कुछ पुण्य के उदय से आपके दर्शन मुझे हुए है। कृपा करके पापमुक्त होने के लिए कोई उपाय बताएँ ।"
 
तभी मार्कण्डेय ऋषिने कहा, "हे माली ! आषाढ मास की कृष्ण पक्ष में जो योगिनी एकादशी आती है, उस व्रत का पालन तुम करो ! ऐसा करनेसे उस व्रत के प्रभाव से तुम सभी पापोंसे मुक्त हो जाओगे ।" यह सुनकर हेम मालीने उस व्रतका कठोरता से पालन किया और कोढमुक्त होकर अलकापुरीको लौट गया और अपनी पत्नी के साथ आनंद में रहने लगा ।
 
८८ हजार ब्राह्मणोंको भोजनदान कराने का फल केवल इस एकादशी के व्रत के पालन से मिलता है । सभी पापोंसे मुक्त होकर व्यक्ति पुण्यवान बन जाता है ।