पद्म पुराण के १४वें अध्याय के क्रिया-सागर-सार नामक खण्ड में श्रीएकादशी के आविर्भाव का वर्णन है।
एक बार जैमिनी ऋषि ने अपने आध्यात्मिक गुरू व्यासदेव से पूछा, "हे गुरूदेव! आपने कृपापूर्वक पूर्वकाल में मेरे समक्ष गगां नदी का इतिहास, भगवान विष्णु की उपासना के लाभ, अन्नदान, जलदान तथा ब्राह्मणों के चरण धोकर उनका चरणामृत जल ग्रहण करने के लाभों का वर्णन किया है। हे महामुनि, श्री गुरूदेव, अब मैं अत्यंत उत्साहपूर्वक एकादशी व्रत के लाभ और एकादशी के आविर्भाव के बारे में सुनने की इच्छा रखता हूँ।
"एकादशी का जन्म कब हुआ और किसके द्वारा वह आविर्भूत हुई? एकादशी के दिन उपवास करने के क्या नियम हैं? कृपया इस व्रत का पालन करने के लाभ बताइये और इसका पालन कब करना चाहिए? श्रीएकादशी के सर्वश्रेष्ठ आराध्य अधिष्ठाता देव कौन हैं? विधिवत एकादशी व्रत पालन न करने से क्या दोष लगते हैं? कृपया मुझ पर अपनी कृपा बरसाइये और इन विषयों का वर्णन कीजिए, क्योंकि आप ही ऐसा करने में सक्षम एकमात्र महात्मा हैं ।"
जैमिनी ऋषि की यह जिज्ञासा सुनकर श्रील व्यासदेव दिव्य आनंद से विभोर हो गये। उन्होंने उत्तर दिया, "हे ब्रह्मर्षि जैमिनि, एकादशी का पालन करने के लाभ पूर्णरूप से स्वयं भगवान नारायण ही बता सकते हैं, क्योंकि श्री नारायण ही उनका पूर्णरूप से वर्णन करने में समर्थ हैं। परंतु मैं तुम्हारे प्रश्न का संक्षेप में उत्तर दूँगा ।"
भौतिक सृष्टि के प्रारंभ में, परम भगवान ने पंचभूतों से निर्मित इस संसार में चल तथा अचल जीवात्माओं की रचना की। साथ ही साथ, दुष्ट मनुष्यों को दंड के उद्देश्य से उन्होंने एक व्यक्ति का निर्माण किया, जिसका स्वरूप सबसे जघन्य पापो का मूर्तरूप था। उसका नाम था पाप-पुरुष । इस व्यक्ति के विभिन्न अंग विभिन्न पाप-कर्मों से हुआ थे ।
उसका मस्तक ब्राह्मण-हत्या के पाप से निर्मित था। उसकी दोनों आँखें मदिरापान के पाप से बनी थीं। उसका मुख स्वर्ण चोरी करने के पाप से बना था । उसकी नाक अपनी पत्नी की हत्या के पाप से बनी थी। उसके कान गुरूपत्नी से अवैध संबंध के पाप से बने थे। उसकी भुजाएं गौ हत्या के पाप से बनी थीं । उसकी गर्दन किसी की एकत्रित संपत्ति चुराने के पाप से बनी थी । उसकी छाती गर्भपात के पाप से बनी थी । उसकी छाती का अधोभाग दूसरे की पत्नि से संभोग के पाप से बना था । उसका उदर अपने संबंधीयों की हत्या के पाप से बना । उसकी नाभि अपने पर आश्रित लोगों की हत्या के पाप से बनी थी। उसकी कमर अभिमानपूर्वक अपनी ही प्रशंसा करने के पाप निर्मित थी । उसकी जाघें गुरू के प्रति अपराध के पाप से बनी थी। उसकी जननेन्द्रियाँ अपनी ही पुत्री को बेचने के पाप से बनी थीं। उसके नितम्ब गुप्त विषयों को उद्घाटित करने के पाप से बने थे। उसके पाँव अपने ही पिता की हत्या के पाप से बने थे। उसके केश सब प्रकार के अल्प पाप कर्मों का स्वरूप थे।
इस प्रकार समस्त पापकर्मों का मूर्तरूप एक भयानक पुरूष प्रकट हो गया। उसके शरीर का रंग काला था, और उसकी आखें पीली थीं। वह पापीयों को अत्यंत क्लेश प्रदान करता है।"
परम भगवान श्रीहरि विष्णु, उस पाप-पुरुष को देखकर अपने आप में ऐसा सोचने लगे, "मैं जीवात्माओं के लिए क्लेशों और सुखों का रचयिता हूँ। मैं उनका स्वामी हूँ। अतः क्योंकि मैंने इस पाप-पुरुष की रचना की है, जो सभी धोखेबाज, बेईमान तथा पापी लोगों को क्लेश प्रदान करता है, इसलिए अब मुझे ऐसा कोई उत्पन्न करना होगा, जो इस पाप-पुरूष को नियंत्रित कर सके।"
उस समय, श्रीभगवान ने यमराज को उत्पन्न किया और विभिन्न नरकलोकों की रचना की। जो जीव अत्यंत पापी होते हैं, उन्हें मृत्यु के पश्चात् यमराज के पास भेजा जाएगा, जो उनके पापों के अनुसार, उन्हें यथोचित नरक लोक में यातनाएँ भोगने के लिए भेजते हैं।
ये समस्त व्यवस्थाएँ करने के पश्चात् जीवों को सुख-दुख देने वाले परम भगवान, पक्षीराज गरूढ़ की सहायता से यमराज के लोक में गये। जब यमराज ने भगवान विष्णु को आते देखा, तो उन्होंने तुरन्त उनके पाद प्रक्षालित किये, उन्हें स्वर्णिम सिंहासन पर आसन दिया। सिंहासन पर विराजमान होकर परम भगवान विष्णु ने दक्षिण दिशा से अत्यंत उच्च स्वर में क्रंदन की ध्वनियां सुनी। इस कारण से वे आश्चर्यचकित हो गये और यमराज से पूछे, "यह उच्च क्रंदन ध्वनि कहाँ से हो रही है?"
यमराज ने उत्तर दिया, "हे देव, पृथ्वी लोक के विभिन्न पापी जीव नरक लोकों में गिर गये हैं। वे अपने दुष्कर्मों के कारण अत्यंत कष्ट भो रहे हैं। यह भयानक क्रंदन उनके पूर्व दुष्कर्मों के प्रभाव से उन्हें मिलने वाली यातनाओं के कारण है।'
यह सुनकर, परम भगवान विष्णु दक्षिण दिशा में नरक लोकों में चले गये। जब नरकवासियों ने उन्हें देखा, तो वे और अधिक उच्च स्वर में क्रंदन करने लग गये। भगवान विष्णु का हृदय करूणा से भर गया। उन्होंने सोचा, "मैंने इन सब जीवो को जन्म दिया है, और मेरे कारण से ही ये कष्ट भोग रहे हैं।"
श्रील व्यासदेव ने आगे कहा, "हे जैमिनि! सुनो, फिर उसके बाद परम भगवान ने क्या किया । वो सब विचार करने के पश्चात करुणामय भगवान ने अचानक अपने ही स्वरूप से एकादशी स्वरूप प्रकट किया। उसके बाद, विभिन्न पापी जीवों ने एकादशी का व्रत पालन करना प्रारंभ कर दिया और वे शीघ्र ही वैकुण्ठ पद तक पहुँच गये। हे वत्स जैमिनि! इस कारण से एकादशी का दिन परम भगवान विष्णु का स्वरूप ही है, जो समस्त जीवों के हृदय में स्थित परमात्मा हैं। श्री एकादशी सर्वश्रेष्ठ पुण्यकर्म है और समस्त व्रतों में सर्वश्रेष्ठ शिरोमणि है।
"श्री एकादशी के आविर्भाव के पश्चात्, पाप के स्वरूप, पाप-पुरूष ने जीवात्माओं पर उसके प्रभाव को देखा। अतः वह अपने हृदय में संदेहों के साथ भगवान विष्णु के पास गया और अनेक प्रार्थनाएं अर्पित करने लगा। भगवान विष्णु ने कहा, 'मैं तुम्हारी प्रार्थनाओं से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हें क्या वरदान चाहिए?'
पाप-पुरूष ने उत्तर दिया, "मैं भी आपके द्वारा उत्पन्न आपकी संतान हूँ, और मेरे माध्यम से ही आप अत्यंत पापी जीवों को यातनाएं देना चाहते थे। परंतु अब, श्री एकादशी के प्रभाव से मैं समाप्त हो चुका हूँ। हे प्रभु! मेरी मृत्यु के पश्चात्, आपके सभी अंश जीव, जिन्होंने भौतिक शरीर धारण किये हैं, वे मुक्त हो जाएंगे और वैकुण्ठ लोक में लौट जाएंगे। यदि सभी जीव मुक्त हो जायेंगें, तो आपके कार्यों में आपका सहयोग कौन करेगा? पृथ्वी लोकों में आपकी लीलाओं में सहयोग देने के लिए कोई नहीं बचेगा। हे केशव! यदि आप इन नित्य लीलाओं को जारी रखना चाहते हो, तो मुझे एकादशी के भय से बचाइये। मुझे कोई पुण्य कर्म नहीं बाँध सकता। केवल एकादशी, आपका प्रकट रूप ही मुझे बाधा दे सकता है। श्री एकादशी के भय से मैंने भागकर चल और अचल जीवों, मनुष्यों, पशुओं, कीटों, पर्वतों, वृक्षों, नदियों, समुद्रों, वनों, स्वर्ग, पृथ्वी और नरक लोकों, देवताओं, और गंधर्वों की शरण ले ली है । परन्तु मुझे कोई ऐसा स्थान नहीं मिल रहा है, जहाँ मैं एकादशी के भय से मुक्त हो पाऊँ । हे मेरे स्वामी! मैं आपकी सृष्टि का ही एक अंश हूँ। अतः आप कृपापूर्वक मुझे कोई ऐसा स्थान बताईये, जहाँ मैं निर्भयतापूर्वक निवास कर सकूँ।"
फिर व्यासदेव ने जैमिनि मुनि से कहा, "ऐसा कहकर पाप-पुरूष भगवान विष्णु के चरणों में गिर गया, जो समस्त कष्टों से अभय प्रदान करने वाले हैं, और रोने लगा ।
तत्पश्चात्, भगवान विष्णु ने पाप-पुरूष की परिस्थिति को देखते हुए, मुस्कुराते हुए ऐसा कहना प्रारंभ किया, "हे पाप-पुरूष, उठो । अब और अधिक शोक मत करो। ध्यान से सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ कि एकादशी के दिन, जो तीनों लोकों में कल्याणकारी है, तुम अनाज रूपी खाद्य पदार्थों की शरण ग्रहण कर सकते हो। इसमें तुम्हें अब भय करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि श्री एकादशी रूपी मेरा स्वरूप तुम्हें अब कोई बाधा नहीं देगा ।" पाप-पुरूष को निर्देश देने के पश्चात्, श्री विष्णु अन्तर्धान हो गये और पाप-पुरूष अपने कार्यकलाप करने के लिए लौट गया ।
इसलिए जो लोग आत्मा के परम कल्याण के लिए गंभीर हैं, वे कभी भी एकादशी के दिन अनाज नहीं खायेंगे। भगवान विष्णु के आदेश के अनुसार इस भौतिक ससांर में उपस्थित समस्त प्रकार के पापकर्म एकादशी के दिन अनाजों में निवास करते हैं।
जो भी एकादशी का पालन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और कभी भी नरक लोकों में प्रवेश नहीं करता। यदि कोई भ्रमपूर्वक एकादशी का पालन नहीं करता, तो वह अत्यंत पापी माना जाता है। एकादशी के दिन पृथ्वी लोक के निवासी द्वारा खाया गया प्रत्येक अनाज का ग्रास लाखों ब्राह्मणों की हत्या करने का फल प्रदान करेगा। यह नितांत अनिवार्य है, कि प्रत्येक मनुष्य को अनाज का त्याग करना चाहिए। मैं बारम्बार जोर देकर कहता हूँ, एकादशी के दिन अनाज मत खाओ। चाहे कोई क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या किसी भी परिवार से क्यों न हो, उसे एकादशी व्रत का पालन करना ही चाहिए । ऐसा करने से वर्ण और आश्रम की सिद्धि प्राप्त हो जायेगी। यदि कोई अनजाने में भी एकादशी व्रत पालन करता है, तो उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वह आसानी से परम लक्ष्य, वैकुण्ठ प्राप्त कर लेता है।"