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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 3: अन्त्य लीला
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अध्याय 9: गोपीनाथ पट्टनायक का उद्धार
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श्लोक 53
श्लोक
3.9.53
‘क्रमे क्रमे दिमु, आर यत किछु पारि ।
अविचारे प्राण लह , - कि बलिते पारि ?’ ॥53॥
अनुवाद
"मैं धीरे-धीरे जितना हो सकेगा, बाकी रकम चुका दूँगा। लेकिन बिना सोचे-समझे तुम मेरी जान लेने वाले थे। मैं क्या कहूँ?"
"I'll pay off the balance gradually. But you were going to take my life without a second thought. What can I say?"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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