श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 8: रामचन्द्र पुरी द्वारा महाप्रभु की आलोचना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.8.38 
रामचन्द्र - पुरी ऐछे रहिला नीलाचले ।
विरक्त स्वभाव, कभु रहे कोन स्थले ॥38॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार रामचन्द्र पुरी जगन्नाथ पुरी में ही रहे। संन्यासियों की रीति के अनुसार, वे कभी-कभी कहीं रुकते और फिर चले जाते।
 
Thus Ramachandra stayed in Puri Jagannath Puri. As is customary among sannyasis, they would sometimes stay in a place and then leave.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)