vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 3: अन्त्य लीला
»
अध्याय 8: रामचन्द्र पुरी द्वारा महाप्रभु की आलोचना
»
श्लोक 38
श्लोक
3.8.38
रामचन्द्र - पुरी ऐछे रहिला नीलाचले ।
विरक्त स्वभाव, कभु रहे कोन स्थले ॥38॥
अनुवाद
इस प्रकार रामचन्द्र पुरी जगन्नाथ पुरी में ही रहे। संन्यासियों की रीति के अनुसार, वे कभी-कभी कहीं रुकते और फिर चले जाते।
Thus Ramachandra stayed in Puri Jagannath Puri. As is customary among sannyasis, they would sometimes stay in a place and then leave.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×