श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 8: रामचन्द्र पुरी द्वारा महाप्रभु की आलोचना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.8.34 
अयि दीन - दयार्द्र नाथ हे मथुरा - नाथ कदावलोक्यसे ।
हृदयं त्वदलोक - कातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम् ॥34॥
 
 
अनुवाद
"हे मेरे प्रभु! हे परम दयालु स्वामी! हे मथुरा के स्वामी! मैं आपके पुनः दर्शन कब करूँगा? आपके दर्शन न होने के कारण मेरा व्याकुल हृदय चंचल हो गया है। हे परम प्रियतम, अब मैं क्या करूँ?"
 
"O Lord! O kind-hearted Swami! O Lord of Mathura! When will I see you again? My troubled heart has become restless from not seeing you. O my most beloved, what should I do now?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)