श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 8: रामचन्द्र पुरी द्वारा महाप्रभु की आलोचना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.8.16 
सन्न्यासीरे एत खाओया ञा करे धर्म नाश ।
वैरागी ह ञा एत खाय, वैराग्येर नाहि ‘भास’ ॥16॥
 
 
अनुवाद
“किसी संन्यासी को बहुत अधिक भोजन कराने से उसके नियम नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि जब कोई संन्यासी बहुत अधिक खाता है, तो उसका त्याग नष्ट हो जाता है।”
 
“Feeding a monk excessively breaks his rules, because when a monk eats excessively, his detachment is destroyed.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)