श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  3.7.121 
स्वगण - सहिते मोर मानिला निमन्त्रण ।
एबे केने प्रभुर मोते फिरि’ गेल मन ? ॥121॥
 
 
अनुवाद
"उन्होंने अपने अन्य भक्तों के साथ मेरा निमंत्रण स्वीकार किया और मुझ पर कृपालु रहे। अब जगन्नाथ पुरी में वे इतने बदल क्यों गए हैं?"
 
He accepted my invitation along with his other devotees and was extremely kind to me. Why has he changed so much here in Jagannathpuri?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)