vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 3: अन्त्य लीला
»
अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट
»
श्लोक 115
श्लोक
3.7.115
प्रभु हासि’ कहे, - “स्वामी ना माने येइ जन ।
वेश्यार भितरे तारे करिये गण न” ॥115॥
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "जो स्वामी [पति] को अधिकारी के रूप में स्वीकार नहीं करता, मैं उसे वेश्या मानता हूँ।"
Sri Chaitanya Mahaprabhu replied with a smile, “I consider a person who does not consider his master (husband) as his authority, to be a prostitute.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×