श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  3.7.102 
आचार्यादि - आगे भट्ट यबे यबे याय ।
राजहंस - मध्ये येन रहे बक - प्राय ॥102॥
 
 
अनुवाद
जब भी वल्लभ भट्ट अद्वैत आचार्य के नेतृत्व वाले भक्तों के संघ में प्रवेश करते थे, तो वे श्वेत हंसों के संघ में बत्तख के समान होते थे।
 
Whenever Vallabha Bhatta entered the assembly of devotees like Advaita Acharya, he appeared like a heron in the assembly of white swans.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)