श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.6.48 
प्रभु बोलाय, तेंहो निकटे ना करे गमन ।
आकर्षिया ताँर माथे प्रभु धरिला चरण ॥48॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने उसे बुलाया, परन्तु रघुनाथदास भगवान के पास नहीं गए। तब भगवान ने बलपूर्वक उसे पकड़ लिया और अपने चरणकमल रघुनाथदास के सिर पर रख दिए।
 
The Lord called him, but Raghunatha Dasa did not approach. Then the Lord forcibly seized him and placed His lotus feet on his head.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)