श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 307
 
 
श्लोक  3.6.307 
शिला दिया गोसाञि समर्पिला ‘गोवर्धने’ ।
गुञ्जा - माला दिया दिला ‘राधिका - चरणे’ ॥307॥
 
 
अनुवाद
“श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुझे गोवर्धन-शिला प्रदान करके गोवर्धन पर्वत के निकट स्थान प्रदान किया है, तथा शंखों की माला प्रदान करके उन्होंने मुझे श्रीमती राधारानी के चरण कमलों में शरण प्रदान की है।”
 
“Sri Chaitanya Mahaprabhu has given me this Govardhan Shila and has given me a place near Govardhan mountain and by giving me a conch shell garland, he has given me shelter at the lotus feet of Srimati Radharani.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)