श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 6: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुनाथ दास गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 237
 
 
श्लोक  3.6.237 
अमानी मानद ह ञा कृष्ण - नाम सदा ल’बे ।
व्रजे राधा - कृष्ण - सेवा मानसे करिबे ॥237॥
 
 
अनुवाद
"सम्मान की अपेक्षा मत करो, बल्कि दूसरों को पूरा सम्मान दो। सदैव भगवान कृष्ण के पवित्र नाम का जप करो और मन ही मन वृंदावन में राधा और कृष्ण की सेवा करो।"
 
Never expect respect, but give respect to others. Always chant the holy name of Lord Krishna and serve Radha and Krishna, the residents of Vrindavan, in your mind.
तात्पर्य
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ने अपने अमृत-प्रवाह-भाष्य में कहा है कि जब स्त्री-पुरुष विवाह करते हैं, उनके बच्चे होते हैं और इस प्रकार वे गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ठ हो जाते हैं। इस गृहस्थ जीवन के बारे में बातों को ग्राम्य-कथा कहते हैं। संन्यासी व्यक्ति ऐसी बातों में ना तो लिप्त होता है और ना ही सुनता है। उसे स्वादिष्ट व्यंजन नहीं खाने चाहिए क्योंकि यह संन्यासियों के लिए अनुपयुक्त है। उसे दूसरों का आदर करना चाहिए लेकिन स्वयं के लिए आदर की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। इस प्रकार व्यक्ति को भगवान का पवित्र नाम का जाप करना चाहिए और विचार करना चाहिए कि वृंदावन में राधा-कृष्ण की किस तरह सेवा की जाए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)