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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  3.5.85 
‘भक्ति’, ‘प्रेम’, ‘तत्त्व’ कहे राये क रि’ ‘वक्ता’ ।
आपनि प्रद्युम्न - मिश्र - सह हय ‘श्रोता’ ॥85॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने निम्न कुल में जन्मे गृहस्थ रामानन्द राय को वक्ता बनाकर भक्ति, आनंदमय प्रेम और परम सत्य का उपदेश दिया। फिर स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु, जो उच्च ब्राह्मण-संन्यासी थे, और प्रद्युम्न मिश्र, जो शुद्ध ब्राह्मण थे, दोनों ही रामानन्द राय के श्रोता बने।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu made Ramanand Rai, a low-born householder, a speaker and preached about devotion, love and ultimate truth. Then the high Brahmin monk Sri Chaitanya Mahaprabhu and the pure Brahmin Pradyumna Mishra both became listeners of Ramanand Rai.
तात्पर्य
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर अपने अमृत-प्रवाह-भाष्य में कहते हैं कि शंकराचार्य की परंपरा के सन्यासी हमेशा सोचते हैं कि वे ब्राह्मणों के सभी कर्तव्यों का पालन कर चुके हैं और इसके अलावा वेदांत-सूत्र के सार को समझकर और सन्यासी बनकर वे स्वाभाविक रूप से पूरे समाज के आध्यात्मिक गुरु हैं। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण परिवारों में पैदा हुए व्यक्ति यह सोचते हैं कि क्योंकि वे वेदों में अनुशंसित कर्मकांड समारोहों को करते हैं और स्मृति के सिद्धांतों का पालन करते हैं, वे अकेले ही समाज के आध्यात्मिक गुरु बन सकते हैं। ये अति उन्नत ब्राह्मण सोचते हैं कि जब तक कोई ब्राह्मण परिवार में पैदा नहीं होता, वह आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता और परम सत्य नहीं सिखा सकता। जन्मसिद्ध ब्राह्मणों और मायावादी सन्यासियों के इस घमंड को काटने के लिए, श्री चैतन्य महाप्रभु ने साबित किया कि रामानान्द राय जैसा व्यक्ति, जो एक शूद्र परिवार में पैदा हुआ और गृहस्थ-आश्रम में स्थित था, वह खुद और प्रद्युम्न मिश्रा जैसी महान विभूतियों का आध्यात्मिक गुरु बन सकता है। यह वैष्णव पंथ का सिद्धांत है, जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं में स्पष्ट है। जो व्यक्ति जानता है कि आध्यात्मिक क्या है और भौतिक क्या है और जो आध्यात्मिक स्थिति में दृढ़ता से स्थिर है, वह जगत-गुरु हो सकता है, पूरी दुनिया का आध्यात्मिक गुरु। कोई भी व्यक्ति जगत-गुरु बनने के लिए आवश्यक सिद्धांतों को जाने बिना केवल खुद को जगत-गुरु के रूप में विज्ञापित करके जगत-गुरु नहीं बन सकता। यहां तक कि जो लोग कभी नहीं देखते कि जगत-गुरु क्या होता है और कभी भी अन्य लोगों से बात नहीं करते, वे सन्यासी बन जाते हैं और खुद को जगत-गुरु घोषित कर देते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु को यह पसंद नहीं था। कोई भी व्यक्ति जो कृष्ण के विज्ञान को जानता है और जो आध्यात्मिक जीवन में पूरी तरह से योग्य है, वह जगत-गुरु बन सकता है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने व्यक्तिगत रूप से श्री रामानान्द राय से सबक लिया और प्रद्युम्न मिश्रा, एक महान ब्राह्मण को भेजा, जो उनसे सबक ले सकें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)