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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  3.5.45-46 
व्रज - वधू - सङ्गे कृष्णेर रासादि - विलास ।
येइ जन कहे, शुने करिया विश्वास ॥45॥
हृद् - रोग - काम ताँर तत्काले हय क्षय ।
तिन - गुण - क्षोभ नहे, ‘महा - धीर’ हय ॥46॥
 
 
अनुवाद
“जब कोई भगवान कृष्ण की लीलाओं, जैसे गोपियों के साथ उनका रास नृत्य, को बड़ी श्रद्धा से सुनता या वर्णन करता है, तो उसके हृदय में वासनाओं का रोग तथा प्रकृति के तीनों गुणों से उत्पन्न व्याकुलता तुरन्त नष्ट हो जाती है, और वह शांत एवं स्थिर हो जाता है।
 
“When one listens to or narrates with utmost devotion the pastimes of Krishna, such as His Rasa dance with the gopis, the lustful desires in his heart and the disturbances caused by the three modes of material nature are immediately destroyed and he becomes patient and calm.”
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर इस संबंध में टिप्पणी करते हैं, ``किस भी व्यक्ति का श्रीमद्-भगवतम में वर्णित कृष्ण के रास नृत्य के मनोरंजन के बारे में सुनने का मन होता है, महान विश्वास और आध्यात्मिक रूप से प्रेरित मन के साथ, वह भौतिकवादी के हृदय में पाए जाने वाली प्राकृतिक वासनाओं से तुरंत मुक्त हो जाता है।''

जब एक पवित्र वैष्णव श्रीमद्-भागवतम पर बोलता है और एक और पवित्र वैष्णव ऐसी एक आत्मा से श्रीमद्-भागवतम को सुनता है, तो वे दोनों आध्यात्मिक दुनिया में रहते हैं, जहां भौतिक प्रकृति के तरीकों का संदूषण उन्हें छू नहीं सकता है। प्रकृति के तरीकों के संदूषण से मुक्त होने पर, वक्ता और श्रोता एक आध्यात्मिक मानसिकता में तय किए जाते हैं, यह जानते हुए कि आध्यात्मिक मंच पर उनकी स्थिति सर्वोच्च भगवान की सेवा करना है। प्राकृत-सहजिया के रूप में जाना जाने वाले पुरुषों की कक्षा, जो भगवान कृष्ण के पारलौकिक शगलों को भौतिक क्षेत्र में एक पुरुष और एक महिला के व्यवहार की तरह मानते हैं, कृत्रिम रूप से सोचते हैं कि रास-लीला सुनने से उन्हें उनके रोगग्रस्त हृदयों की वासनाओं को कम करके उनकी मदद मिलेगी। लेकिन क्योंकि वे नियमन सिद्धांतों का पालन नहीं करते हैं, बल्कि साधारण नैतिकता का भी उल्लंघन करते हैं, रास-लीला पर उनका चिंतन एक निरर्थक प्रयास है, जिसके परिणामस्वरूप कभी-कभी गोपियों और भगवान कृष्ण के व्यवहार करते हैं। प्राकृत-सहजिया की ऐसी आदतों को मना करने के लिए, श्री चैतन्य महाप्रभु ने शब्द विश्वास ("विश्वास") का उपयोग करके अपनी भौतिक बुद्धि को बाहर रखा है। श्रीमद-भागवतम (10.33.30) में, श्रील शुकादेव गोस्वामी कहते हैं:

नैतत समकरेज जतु मनसापि ह्य नीश्वर

विनश्यत्य आचरन मौध्याद यथा रुद्रो ब्धिजम विषम

"निश्चित रूप से जो सर्वोच्च भगवान नहीं है, उसे अपने मन में भी कृष्ण के पारलौकिक रास-लीला की गतिविधियों की नकल नहीं करनी चाहिए। यदि अज्ञानता से कोई ऐसा करता है, तो वह नष्ट हो जाएगा, जैसे कि वह भगवान शिव की नकल कर रहा था, जिन्होंने महासागर से उत्पन्न जहर पिया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)