Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.5.20 
सेव्य - बुद्धि आरोपिया करेन सेवन ।
स्वाभाविक दासी - भाव करेन आरोपण ॥20॥
 
 
अनुवाद
श्रील रामानन्द राय ऐसा इसलिए करते थे क्योंकि वे स्वयं को गोपियों की दासी मानते थे। इस प्रकार, यद्यपि बाह्य रूप से वे पुरुष प्रतीत होते थे, आंतरिक रूप से, अपनी मूल आध्यात्मिक स्थिति में, वे स्वयं को दासी मानते थे और दोनों कन्याओं को गोपियाँ मानते थे।
 
Srila Ramanand Raya did this because he considered himself, in his natural state, to be a slave to the gopis. Thus, although he appeared to be a man on the outside, in his original spiritual state within, he considered himself to be a slave and the two girls to be gopis.
तात्पर्य
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर अपने अमृत-प्रवाह-भाष्य में लिखते हैं: "श्रील रामानंद राय ने एक नाटक लिखा था जिसका नाम जगन्नाथ-वल्लभ-नाटक था, और इसमें विचारधारा को प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने दो ऐसी युवा लड़कियों को शामिल किया, जो पेशेवर नर्तकियां और गायिकाएं थीं। ऐसी लड़कियों को, जिन्हें देव-दासियां कहा जाता था, आज भी जगन्नाथ मंदिर में नियुक्त किया जाता है, जहां उन्हें महारियों कहा जाता है। श्री रामानंद राय ने दो ऐसी लड़कियों को शामिल किया और क्योंकि उन्हें गोपियों की भूमिका निभानी थी, उन्होंने उन्हें सिखाया कि गोपियों के समान विचारों को कैसे जगाया जाए। क्योंकि गोपियां पूज्यनीय व्यक्तित्व हैं, इसलिए रामानंद राय, जो उन दोनों लड़कियों को गोपियां और खुद को उनकी दासी मानते थे, उनकी सेवा में शरीर को साफ करने के लिए तेल से उनकी मालिश करके संलग्न हो गए। क्योंकि रामानंद राय हमेशा खुद को गोपियों की दासी के स्थान पर रखते थे, इसलिए लड़कियों के साथ उनका पूर्वाभ्यास वास्तव में आध्यात्मिक मंच पर था।"

क्योंकि जब श्री रामानंद राय लड़कियों की सेवा कर रहे थे तब व्यक्तिगत आत्मसंतुष्टि का कोई सवाल ही नहीं था, इसलिए उनका मन स्थिर था और शरीर अपरिवर्तित था। इसका अनुकरण नहीं किया जाना चाहिए, और न ही ऐसी मानसिकता श्री रामानंद राय के अलावा किसी के लिए संभव है, जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु बताएंगे। श्री रामानंद राय का उदाहरण निश्चित रूप से अनूठा है। श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक ने यह विवरण दिया है क्योंकि पूर्ण भक्ति सेवा में कोई भी इस तरह का पद प्राप्त कर सकता है। फिर भी, इस विषय को बहुत गंभीरता से समझना चाहिए और ऐसी गतिविधियों की नकल करने का कभी प्रयास नहीं करना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)